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यही वह प्रक्रिया है, जिसका अनुसरण करना चाहिए और जिसमें हम सबका ध्यान व हित अपेक्षित है। हमें उस विचार को अवश्य छोड़ देना चाहिए, कि हम उत्तराधिकार के नियमों और अन्य धर्मों के व्यक्तियों के सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। इस विचार को निश्चित ही त्याग दें। मौजूदा दौर में एक सुव्यवस्थित समाज बनाने के बजाए हम इस पुराने ढांचे से जुड़े हुए हैं, जिसका निर्माण तब किया गया था, जब हमें अलग-थलग रखने का लक्ष्य था। तब विचारों में परिवर्तन हुआ है। हमारे देशवासियों की सुरक्षा और संपन्नता भी एक समान सिविल सिंहिता के अधिनियमन की मांग करती है। मुझे यह चिन्ता नहीं है कि ऐसा करने से कुछ पारंपरिक मित्रों की भावनाएं आहत होंगी। हम, अंशतः पुरानी बातें से और अंशतः नई बातों से जुड़कर नहीं रह सकते। इस संबंध में मैं बताना चाहता हूँ कि एक समान सिविल संहिता गोआ में प्रचलित है। कानून मंत्री स्वयं इस बारे में जानते हैं। पूर्तगालियों के अधीन भारत के इस किस्से में उत्तराधिकार, आदि का कानून ईसाइयों, हिंदुओं, मुस्लिमों एवं प्रत्येक व्यक्ति पर एक समान रूप से लागू है। यदि ऐसा है, तो हमें इससे क्यों भय है? हमारा भय यह है कि अतीत से हमने क्या हासिल किया है, यानी हमारी रूढि़वादिता। मैंने धार्मिक और अर्ध-धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप के करने के बारे में जो कहा था। वह ब्रिटिशों ने अपने प्रयोजनों के लिए किया गया था क्योंकि वे हमें बाँटकर अलग-थलग रखना चाहते थे। पर अब राष्ट्र के अपने सभी लोगों को संगठित करना हमारा आदर्श है। इसलिए इस तरह के विधेयक पर कार्यवाही करने के बजाय हमारे कानून मंत्री को 26 जनवरी, 1950 के तुरंत बाद एक समान सिविल संहिता को भारत के सभी लोगों पर लागू करना चाहिए। मैं जानता हूँ कि मेरी उत्साही सदस्य बहनें सोचती हैं कि मैं जब बोलने के लिए खड़ा हुआ था तो मैं इस विधेयक के विरोध में था। किंतु मुझे यह कहने दिया जाए कि मैं पूर्णतः सभी बातों में समानता चाहता हूँ, लेकिन उस तरीके से नहीं जिस तरीके से हम यह कर रहे हैं। यहाँ हम एक चीज को समाप्त करके दूसरी तरफ कठिनाइयां उत्पन्न कर रहे हैं। एक समान सिविल संहिता के संबंध में, हम अपने हिंदू मित्रों को बता सकते हैं कि संयुक्त हिंदू परिवार प्रथा अवश्य जानी चाहिए, ऐसा देश के हित में भी आवश्यक है। किंतु हम विपरीत दिशा में कार्य कर रहे हैं। अतः मुझे भय है कि इससे बहुत ही अवांछनीय और अप्रत्यशित परिणाम सामने आएंगे। मैं एक उदाहरण उद्धत करना चाहूँगा बंबई प्रांत के अहमदनगर शहर में एक युवा हिंदू विधवा एक मुस्लिम से शादी करना चाहती थी। मैं नहीं जानता था परन्तु वह मुस्लिम से शादी करने को इच्छुक थी। जैसा आप जानते हो इन दिनों देश काफी नाजुक दौर से गुजर रहा था, उसमें कई समस्याएं थीं। कई उपद्रव हुए थे और कई जानें चली गई थीं, इसलिए वह मुस्लिम व्यक्ति न केवल अपनी सुरक्षा के लिए भयभीत था, अपितु अपने समुदाय की सुरक्षा के लिए भी भयभीत था। उसने कहा कि मैं विवाह नहीं कर सकता। वह इस्लाम कबूले बिना शादी नहीं कर सकती थी, क्योंकि इस मुस्लिम व्यक्ति के पहले से पत्नी और बच्चे थे। बम्बई प्रांत में ही हमने ऐसा कानून बनाया है, जिसमें