हिन्दू संहिता - जारी... - Page 647

632 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

किसी हिंदू को एक साथ एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति नहीं है, किंतु वहाँ मुसलमानों पर ऐसा कोई बंधन नहीं है। मौजूदा विधेयक के अनुसार भी आप मुसलमानों को कई पत्नियाँ रखने का अधिकार दे रहे हैं और वे किसी भी समय चार पत्नियाँ तक रख सकते हैं। परिणाम यह होगा कि यदि कोई धनाढ्य व्यक्ति एक और विवाह करना चाहता है, तो वह स्वयं मुसलमान बन जाएगा, और तब वह अपनी इच्छानुसार जितनी चाहे उतनी पत्नियां रख लेगा। इसलिए इन परिप्रेक्ष्यों में देश के हित में मांग यह है कि हमें सभी के लिए एक समान सिविल संहिता बनाने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। यही संपूर्ण विश्व में हो रहा है। और जैसा मैंने पहले भी कहा था कि इस प्रकार की संहिता भारत में पुर्तगलियों के अधीन गोवा में भी प्रचलित है। यहाँ प्रस्तुत मौजूदा हिंदू संहिता हमारे पूर्व शासकों की एक कृत्रिम सोची-समझी रणनीति थी, क्योंकि वे हमें अलग रखने का प्रयास कर रहे थे। अब हमें उस पुराने ढर्रे से निजात पाने का प्रयास करना चाहिए। हमें एक सु-स्थापित एक समान समाज बनाने का ही प्रयास करना चाहिए।

अब हिन्दू, मुस्लिम या अन्य कोई किसी धार्मिक सम्प्रदाय के बजाय, हमें एक राष्ट्र अर्थात् एक वास्तविक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र बनाना चाहिए।

इसके लिए एक समान सिविल संहिता बनाना नितांत आवश्यक है। अतः मेरा सुझाव है कि इस विधेयक पर अभी आगे कार्यवाही न की जाए। इसलिए मैं, अपने माननीय कानून मंत्री से अपील करता हूँ कि इस विधेयक को वापस लेकर इस विधेयक में मैं समाहित मामलों से संबंधित एक समान सिविल संहिता प्रस्तुत करें, ताकि वह हिन्दू, ईसाईयों, मुसलमानों, पारसियों, यहूदियों या अन्यों सभी नागरिकों पर एक समान रूप से लागू की जा सके।

ऽश्री रामसहाय (मध्य भारतः सामान्य)ः महोदय, इस विधेयक की प्रवर समिति के समक्ष प्रस्तुत के दौरान, इसका स्वागत करते हुए मैंने कहा था कि प्रवर समिति के सदस्यों को इसकी उन विशेषताओं पर भी विचार करना चाहिए जिनका आधुनिक संस्कृति और सभ्यता के साथ मतभेद है। किंतु मैंने देखा है कि उन्होंने उस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया है हम केवल कल ही जान पाए हैं कि इस संबंध में एक समिति का गठन एक बार दुबारा किया जा रहा है। केवल इस कारण से ही मैंने इस सदन का थोड़ा और समय लिया है। मैंने इस विधेयक का विरोध नहीं किया है। मैं केवल कुछ संशोधन चाहता हूँ, जिससे जो इसका विरोध कर रहे हैं उनके दृष्टिकोणों को कुछ हद तक समायोजित किया जा सके और इसी कारण से मैंने सदन का कुछ समय लिया है।

मेरा कथन है कि माननीय श्री संथानम के मुताबिक इस विधेयक के माध्यम से हम सभी जाति-विभेदों को निरस्त करने जा रहे हैं। और एकता की ओर बढ़ने वाले हैं। मैं

ऽसी.ए. (विधि.) डी., खंड 6, भाग II, 12 दिसंबर, 1949, पृष्ठ 496-98