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सहमत हूँ कि ऐसे विचार और इस प्रकार का कोई विधेयक स्वागत योग्य है और हमें इसीलिए इसका स्वागत अवश्य करना चाहिए। मेरे मत से किसी को भी इस पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि अंतरजातीय विवाह, दत्तकग्रहण मुमकिन हो जाएँ तथा एक-दूसरे के साथ अन्य पारिवारिक संबंध विकसित हो जाएं। किंतु इस संबंध में मैंने थोड़ी कठिनाई भी अनुभव की है जिसे मैं सदन के समक्ष चाहूँगा। यह उत्तराधिकार मामले से संबंधित है। निःसंदेह उत्तराधिकार की परंपरा का कई स्थानों पर प्रचलन है और उसका अनुपालन भी किया जा रहा है, जबकि यहाँ पुत्रियों को समान आधार पर हिस्सा दिया गया है। मुझे इस पर भी कोई आपत्ति नहीं है कि वे अधिक हिस्सा उन्हें दें। पर मैं सदन के समक्ष संभावित कठिनाइयों के संबंध में कुछ बातें रखना चाहता हूँ जो भविष्य में घटित हो सकती हैं जब इस तरह की समस्याए आएंगी।
वर्तमान में, पुत्रियों का हिंदू समाज में विशेष दर्जा है जबकि अन्य जगह ऐसा नहीं है। हमने जाने या अनजाने में सामाजिक परंपराओं के साथ अनावश्यक छेड-छाड़ की है और अब पश्चाताप स्वरूप एवं क्षतिपूर्ति हेतु इस विधेयक को प्रस्तुत कर रहे हैं। यह निश्चित रूप से हमारा दुर्भाग्य ही है। इसके बावजूद मैं कहूँगा कि सुधार हेतु अभी काफी गुंजाइश बाकी है। मेरे मत से कोई भी हिंदू पिता अपनी पुत्री के साथ भेदभाव नहीं करना चाहेगा अपितु उसे अधिकाधिक देने की चाहत ही रखता है।
बाबू श्यामनारायण सिंह (बिहारः सामान्य)ः ऐसा काफी हद तक सही है।
श्री राम सहायः एक पिता अपनी पुत्री का विवाह उस घर में करना चाहता है जिसका स्तर उससे ऊपर हो। न केवल पिता, मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कोई हिंदूभाई भी यह नहीं चाहेगा कि उसकी बहन का विवाह किसी अच्छे घर में न हो। हजारों या लाखों में कोई इसका अपवाद हो सकता है, किंतु ऐसा भी हो सकता है कि कोई न कोई न मिले। अतः मैं यह समझ नहीं पाता कि उत्तराधिकार के मामले में क्यों हम पुत्रों और पुत्रियों के बीच समानता के लिए लड़ें। मैंने ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि हमारे समक्ष हमारे मध्यम वर्ग में संपत्ति बंटवारे को लेकर भाइयों के बीच झगड़े होते रहते हैं। अभी पुत्री को दूसरे परिवार में उसका हिस्सा दिया जाता है। किंतु क्या पुत्री को भी अपने पिता की संपत्ति में अपने हिस्से के बारे में नहीं सोचना चाहिए? मेरे विचार में इससे हमारे सामाजिक सरोकार में निश्चित रूप से व्यवधान पैदा होगा। मैंने सदन के समक्ष इस विचार में इस मुद्दे को पेश किया है कि इससे कुछ हद तक भाई और बहन के मध्य प्रेम में भी दरार पड़ सकती है। जब संपत्ति के बंटवारे पर भाईयों के बीच पारिवारिक टकराव मुमकिन है, तो निश्चित है अलग परिवार में रह ही पुत्री के साथ गम्भीर झगड़े होंगे। जब भाईयों में, जिनमें आपसी प्रेम है के बावजूद झगड़ा पैदा हो सकता है, तो पुत्री कहाँ जाएगी? कौन है जो उनके सौहार्द को बचाएगा? इसके बरअक्स कौन मुकद्दमेबाजी के लिए प्रेरण्य और राह दिखाएगा? मैं