634 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यह बिल्कुल नहीं समझा पाता कि हम क्यों एक परिपक्व स्थिति में छेड़खानी करें? यह पूरी तरह जानते हुए भी कि ऐसा करने से घर में कलह ही होगी।
इसी मैं हिंदू संयुक्त परिवार के संबंध में भी कुछ कहना चाहता हूँ। हमने सहकारी संस्थाएँ स्थापित करने को मान्यता दी है और उसमें जन-साधारण के सहयोग को आमंत्रित किया है, ताकि इस विचार को देश में फैलाया जा सके। फिर हम क्यों संयुक्त परिवार पद्धति को समाप्त करने पर आमादा हैं, जो ‘सहयोग’ को सिद्धांत पर आधारित है? उपरोक्त दोनों बातों को ध्यान में रखते हुए विधेयक में कुछ ऐसे प्रावधान होने चाहिए, जिससे इन दोनों समस्याओं का समाधान हो सके। मेरी राय में जनता के कुछ वर्गों में फैली अधीरता और जिस प्रावधान से यह कार्यवाही विवादास्पद हुई है उसका कारण है- ‘उत्तराधिकार का मुद्दा’। मुद्दा इसलिए यदि किसी तरह हम उत्तराधिकार के इस मुद्दे पर सहमत हो जाएँ, तो इस पर उचित विचार-विमर्श करके कार्यवाही को आगे बढ़ा सकते हैं। और इस संहिता को सर्वसम्मति से पारित कर सकते हैं। मैं सदन का ज्यादा वक्त न लेते हुए मात्र यह कहना चाहूँगा कि जो सदस्य अगली समिति में नियुक्त किए जाने हैं, वे कठिनाई को मद्देनजर अपनी औपचारिक बातचीत जारी रखें इसलिए नहीं कि किसी पुत्री को उसके पिता की संपत्ति में से हिस्सा नहीं दिया जाए अपितु यह देखें इससे हमारी सामाजिक पद्धति में किसी तरह का व्यवधान न आए।
यहाँ एक और विवादित बात ने मुझे झकझोरा है। मैं गलत हो सकता हूँ किंतु मैंने जहां तक इस पर सोचा है और मुझे ऐसा लगा कि एक पुत्र और एक पुत्री के मामले में इस विधेयक के अनुसार किसी पुत्र का केवल अपने माता-पिता की संपत्ति में हिस्से का हक है, जब कि किसी पुत्री को अपने ससुर की संपत्ति में भी हिस्सा दिया जा सकता है। यहाँ मैं इस असमानता के लिए कोई उचित कारण नहीं देख पाता हूँ। मैं समझ नहीं सका कि इसमें ऐसा प्रावधान क्यों बनाया गया है। माननीय कानून मंत्री से अनुरोध है कि चर्चा के दौरान इस पहलू पर भी कुछ प्रकाश डालें कि किस कारण से इस प्रावधान को शामिल किया गया है। अब सदन का अधिक समय न लेते हुए मैं यहीं पर अपनी बात समाप्त करता हूँ।
* श्री कृष्ण चंद्र शर्मा (यू.पी.ः सामान्य)ः महोदय, मैंने इस चर्चा को बड़े ध्यान से सुना है। मैं अपने वरिष्ठों विशेषकर पंडित ठाकुर दास भार्गव और पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेय द्वारा व्यक्त विचारों का बड़ा आदर करता हूँ। इसलिए उनके बाद मैं उनके समर्थन की भी प्रतीक्षा कर रहा हूँ। क्योंकि उनके अनुसार यह हिंदू संहिता विधेयक हमारी संस्कृति और सभ्यता के साथ छेड़छाड़ करता है और यदि इसे कानूनी जामा पहना दिया गया,
ऽसी.ए. (विधि.) डी., खंड 6, भाग II, 12 दिसंबर, 1949, पृष्ठ 498-502