हिन्दू संहिता - जारी... - Page 650

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तो हमारे समाज की पूरी व्यवस्था ही ढह जाएगी और इससे हमारी धार्मिक व्यवस्था और हमारी प्राचीन संस्कृति में भी अनुचित एवं अनुप्युक्त हस्तक्षेप हो जाएगा। पर यह मेरा दुर्भाग्य है कि मुझे इसमें ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा।

इस संहिता के संबंध ऐसा कुछ नहीं है, जो किसी भी मामले में हमारे धर्म के साथ हस्तक्षेप करे। यह संहिता सही है या गलत यह अलग प्रश्न है। किंतु प्रस्तावित विधेयक पर हिंदू धर्म से कोई सरोकार नहीं है और यदि वह विधेयक पारित होता है तो हिंदू धर्म अच्छा व बुरा जैसा भी है, इसके बाद भी वैसा नहीं रहेगा। दूसरा प्रश्न संस्कृति का है। प्रश्न यह है कि क्या कोई घर A या B का है? वह रामकुमार और कृष्णकुमार का हो सकता है और उनके साथ यदि विमलकुमारी भी शामिल हो जाए, तो इससे भी हिंदू संस्कृति प्रभावित नहीं होगी। मेरे मित्र मुझे बीच में टोकें, इससे पहले ही मैं कहना चाहूँगा कि वे संस्कृति के आधार को समझें। कोई संस्कृति तब तक संस्कृति नहीं है, जब तक उसमें समाज के विकास और प्रगति के दृष्टिकोण की कोई बात न हो। यदि संस्कृति मात्र स्थैतिक है तो यह ज्यादा नहीं चलेगी तथा न ही लम्बे समय तक बरकार रहेगी। यदि हिंदू संस्कृति भी स्थैतिक होती, तो वह टिकाऊ न हो पाती और लंबे समय तक बरकरार रह पाती। संस्कृति का प्रगति के साथ कुछ-न-कुछ संबंध अवश्य रहता है और उसका सरोकार प्रगतिशील समाज से भी अवश्यंभावी है। संस्कृति खतरे में है ऐसा कहने से पूर्व हमें इस सब पर विचार कर लेना चाहिए। संस्कृति और धर्म और वर्तमान हिंदू समाज या हिंदू कानून, यहाँ तक कि हिंदूधर्म भी उस तरह के नहीं हैं जिस तरह के वे वैदिक समय थे। क्या आप इस पर विश्वास कर सकते हैं कि यूनानी यहाँ आए, रोमवासी यहाँ आए, उनका प्रभाव यहाँ पड़ा, उससे क्या हम अप्रभावित रह सके? क्या हमारे पास कोई हृदय, मस्तिष्क तथा ग्राह्यता नहीं थी? उस ग्राह्यता और प्रगतिशीलता की क्षमता के कारण ही हम अपनी महानता को बरकरार रख सके। अगर हम में ग्राह्यता की क्षमता न होती तो हम इतने लम्बे समय तक टिके ही न रह पाते। यही मेरा उत्तर है। इसलिए हमें तार्किकता का मार्ग अपनाना चाहिए, हमें प्रत्येक मुद्दे पर तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। ‘स्मृति’ में जो हिंदू कानून दिया गया है, वह स्मृतिकारों से पूर्व के रीति-रिवाजों और तत्कालीन प्रयोगों का मात्र संहिताकरण है। हमारी पूर्व ‘स्मृतियाँ’ हैं और उनमें विभिन्न मुद्दों पर मतभेद भी हैं। यानी एक ही मुद्दे पर विभिन्न स्मृतिकारों ने विभिन्न दृष्टिकोण दिए हैं। प्रीवी कौंसिल ने कहा है कि एक दूसरे से भिन्न होने के बावजूद, उनकी व्याख्याओं को मात्र इसलिए स्वथार्य नहीं किया गया क्योंकि यह स्मृतियाँ या सच्चाई या वेदों पर आधारित हैं, अपितु इसलिए कि जो स्मृति में दर्ज है, वे उस स्मृति से पहले के प्रयोग या रीति-रिवाज होते थे। हिंदू कानून के अनुसार परंपराएं लिखित कानून और लिखित ग्रंथों से ऊपर होती हैं। अब इस दृष्टिकोण के आधार पर मैं आपसे गंभीरतापूर्वक पूछना चाहूँगा कि क्या यह धर्म का कोई प्रश्न है क्या यह संस्कृति का प्रश्न है_ क्या हिंदू समाज रामकुमार और कृष्णकुमार के साथ