636 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
विमलकुमारी का शामिल करने से पतित हो जाएगा? अतः इस प्रश्न में धर्म को न लाया जाए। इसमें संस्कृति या अन्य बातों को भी न लाएँ और यह न करें कि हिंदू समाज पतित हो जाएगा। अतः मेरा कहना है कि हिंदू समाज, हिंदू संस्कृति, न ही हिंदू धर्म कभी इतना कमजोर रहा है कि वह इस अधिनियम से या किसी अन्य अधिनियम के पारित होने से यह गिर जाएगा। वह काफी मजबूत है।
इसके बाद यह भी कि यह मात्र हमारा दावा नहीं है कि हम ईश्वर की संतान हैं। यहाँ छः बड़ी सभ्यताएँ हुई हैं और प्रत्येक बड़ी सभ्यता ने दावा किया है कि वह ईश्वर से उत्पन्न हुई हैं। मुसलमान भी ऐसा कहते हैं, ईसाई भी ऐसा कहते हैं, जापानी भी कहते हैं। ‘‘मैं भगवान का पुत्र हूँ।’’ 1559 में चीनी सम्राट ने जार्ज III को एक पत्र में लिखा था, चीनी शासक को ईश्वर ने भेजा है। इसलिए उसके क्षेत्र का ब्रिटिश व्यापार से कुछ भी लेना-देना नहीं है, इसीलिए उसे विदेशियों द्वारा कलंकित होने से बचाया जाएगा। किंतु 49 वर्षों बाद जब अंग्रेजों ने चीन से युद्ध किया, तो अंग्रेजों के साथ अफीम का व्यापार भी किया गया। तब ईश्वर पुत्र का वह क्षेत्र कहाँ चला गया था? और तब वे ईश्वर-पुत्र कहाँ भाग गए थे जब अंग्रेजों की बंदूकें उनके सामने आई थीं? उधर अंग्रेज भी यही दावा करते थे कि यह उनका दायित्व है कि उन्हें अन्य ‘मानवों को सभ्य बनाने के लिए अफ्रीका और भारत भेजा गया था तब ऐसा करना ही उनकी नियति में था। किंतु वे सभी दावे झूठे साबित हुए-ऐसे झूठे, जेसा हमारे अपनी ‘सच्चाई के एकाधिकार’ के दावे के साथ भी हुआ। मैं हिंदू हूँ, और मैं ब्राह्मण हूँ, और मुझे हिंदू और ब्राह्मण होने पर गर्व है, किंतु मैं ऐसा दावा नहीं करना चाहूँगा जहाँ सच्चाई पर मेरा स्वयं का एकाधिकार है और मैं कहूँ कि सच्चाई केवल मेरे पूर्वजों के पास भी नहीं थी किसी अन्य पास। यदि सच्चाई केवल मेरे पूर्वजों के पास थी, न कि किसी अन्य के पास, तो यह अनुचित अनैतिक ही था। या शायद पूर्वजों ने भी उसी ईश्वर ने इस पृथ्वी पर अन्य व्यक्तियों को उत्पन्न किया। अतः मेरा अनुरोध केवल यह है-और मेरा अनुरोध एक हिंदू बच्चे को अपने बड़ों के प्रति पूरी नम्रता और सम्मान के साथ है- कि कृपया धर्म को इसमें न घसीटें, संस्कृति को इसमें न लाएं। और यह भी न कहें कि हिंदू समाज पतित हो जाएगा। अतः इसे इसी दृष्टिकोण के आधार पर, सामान्य ज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर तथा आधुनिक संसार में प्रचलित कानूनों के आधार पर स्वीकार करें। प्रत्येक देश का कानून, उस देश की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों का प्रतिफल और परिणाम के साथ-साथ उन स्थितियों से सामंजस्य स्थापित करने के लिए उसकी बौद्धिक क्षमता की अभिव्यक्ति भी है।
मैं अब अगली बात पर आता हूँ। हम लम्बे समय से इस विश्व में कुछ अलग तरह से रहते रहे है। मैंने कहा था कि जहाँ छह प्रकार की सभ्यातएं थी उनमें चीनी शासक, जापानी सम्राट, अंग्रेज राजा, रूसी जार और भारत के बादशाह बाबर आदि सभी ने यह दावा किया था कि ईश्वर ने ही उन्हें यहाँ भेजा था क्योंकि...