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पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रेयः मेरे माननीय मित्र हिंदू संहिता के किस विशेष धारा का हवाला दे रहे हैं?
श्री कृष्ण चंद्र शर्माः मैं आपकी टिप्पणी का हवाला दे रहा हूँ। जैसा पूर्व में मैंने कहा कि उन सभी ने कहा था कि वे उच्चतम थे और बहुत बलशाली थे और ऐसा उन्होंने इसलिए कहा था क्योंकि वे अन्य लोगों को समझ नहीं सके और उन्हें उनके बारे में जानकारी ही नहीं थी। अतएव उन्होंने कहा था कि उनका धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। किंतु अब आप विमान, जहाज, साहित्य एवं मुद्रणालय तथा प्रकाशन के माध्यमों से विश्व के सभी लोगों से संपर्क कर सकते हैं। इससे आपने दूसरे लोगों को जाना है और आप उनसे प्रभावित भी हुए हैं। अगर आप अपने बच्चों की मेज देखें तो वहाँ आपको बनार्ड शॉ और शेक्सपिअर का साहित्य दिख जाएगा। पर वहाँ आपको ‘गंगा लहरी’ नहीं मिलेगी। किंतु आप इससे यह नहीं समझेंगे कि बच्चा हिंदू नहीं है क्योंकि उसकी मेज पर केवल बर्नाड था और शेक्सपीअर या पर्ल बक हैं इस तरह प्रत्येक सोच और कार्रवाई विश्व के सभी देशों को प्रभावित करती है और असर डालती है। अब आपके पास ऐसा कोई कानून नहीं होगा जो अन्य के प्रभावों से वंचित हो। वह गतिशील होगा तभी वह लोगों का भविष्य बेहतर बनाने में मददगार होगा। इससे वंचित होकर, इससे अलग होकर आप कमजोर हो जाएंगे। इसलिए वैज्ञानिक आधार पर ही कानून बनाए जाएं। अतीत में पूर्णग्रह रहे होंगे और अलग तरह के रीति-रिवाज रहे होंगे तथा वहाँ कई अन्य बातें भी संभव रही होंगी किंतु आज धर्म भी वैज्ञानिक अध्ययन का विषय है। आप यह नहीं कह सकते कि जिस चीज पर आप विश्वास करते हैं वही धर्म है। कोई भी इसे स्वीकार नहीं करेगा। धर्म वह है, जो मानव को उच्चतर बनाता हो और उसके जीवनदर्शन को ईश्वर के समीप लाता हो और मानवता के स्तर से उसे देवत्व की ओर ले जाता हो। यही कुछ ऐसे स्वीकार्य सिद्धांत हैं, जिनसे बचना मुश्किल है। इसलिए इस 20वीं शताब्दी में प्रत्येक चीज धर्म है, न ही प्रत्येक चीज संस्कृति है न ही प्रत्येक चीज किसी समाज का आधार है। यहाँ किंचित स्वीकृत सिद्धांत हैं, जिन्हें बहुतायत में विश्व द्वारा न्यायविदों, धार्मिक गुरुओं, विश्व के महान हस्तियों द्वारा समाज, संस्कृति एवं धर्म के रूप में स्वीकार किया गया है। जो कुछ आप बोलते हैं। और जिस पर विश्वास करते हैं वह न धर्म है, न कोई संस्कृति है और न ही समाज का कोई आधार है।
मेरे मित्र ने मुझसे पूछा, मैं किस का हवाला दे रहा था। श्री मुल्ला से ‘हिंदू कानून’ पुस्तक में प्रथम पृष्ठ पर जातियों के बारे में बताया गया है। उसमें हिंदू समाज की चार जातियों का उल्लेख है। उसके दूसरे पैरा में बताया है क्या व्यायरूप ‘शुद्र’ है? तीसरा पैरा कहता है कि क्या मराठे शूद्र हैं या क्षत्रिय हैं? मैं विनम्रपूर्वक आपसे पूछता हूँः क्या इसमें संस्कृति या धर्म की कोई बात है? धर्म का आशय सांसारिक प्रेम से दैनिक आनन्द में ले जाना है। और संस्कृति का अर्थ आलोक और सौहार्द है। लोगों का जाति के आधार पर वर्गीकरण कोई संस्कृति नहीं है और इसका धर्म से तो कोई संबंध ही नहीं है।