हिन्दू संहिता - जारी... - Page 653

638 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

एक माननीय सदस्यः केवल कृषि?

श्री कृष्ण चंद शर्माः कृषि आप को भोजन देती है। पर आपके ऐसे विचार आपको क्या देंगे?

अब मैं आपको हिन्दू-कानून के स्रोतों के बारे में भी बताऊंगा। मेरा मानना है कि मेरे माननीय मित्र जो एक वकील है और वह इसकी सराहना करेंगे। हिंदू कानून के स्रोत हैंः- श्रुतियाँ, स्मृतियाँ, रीति-रिवाज जो कानून के समतुल्य हैं_ व्याख्याएँ और इनके अतिरिक्त प्रीवी काउंसिल और अन्य न्यायालयों के न्यायिक निर्णय। जहाँ तक श्रुतियों का संबंध है तो उसके बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं है। मैंने श्री जायसबाल के संदर्भ से कहा था जिनकी प्राचीन राजतंत्र पर अच्छी पकड़ है, और उनके अनुसार स्मृतियों में जो भी उल्लिखित है वह प्रचलित रीति- रिवाजों एवं प्रचलनों का संहिताकरण मात्र है। मैंने कहा था कि कुछ बातों पर स्मृतियों में मत-भेद भी हैं। टीकाकारों ने उन्हें स्वीकार किया है पर उन्होंने उन्हें प्राधिकार के रूप में इसलिए नहीं स्वीकारा है कि वे यह बताएँ कानून क्या था, अपितु इसलिए कि वे यह बताएँ। वह अस्तित्व में था। हिंदू कानून के सिद्धांतों के अनुसार उसमें लिखित कानून की अपेक्षा, रीति-रिवाजों एवं परंपराओं का ज्यादा महत्व है उन्हें ही स्वीकारा जाता है। अब प्रीवी काउंसिल और उच्चतम न्यायालयों के मामले आते हैं। यह किस प्रकार बना? 1868 तक स्थिति यह थी कि हिंदू कानून को अंग्रेज जजों द्वारा हिंदू पंडितों के सहयोग से लागू कराया जाता था। पर पंडितों की न्यायालयी सरकारी मध्यस्थता को न्यायालयों में 1868 में समाप्त कर दिया गया था। आपका केस कानून पंडितों के सहयोग से अंग्रेजों के निर्णय का परिणाम है। मैं अब आपको बताता हूँ कि जब भी देश पर आक्रमणकारी ने शासन किया जब भी देश पर घुसपैठियों ने शासन किया, देश के असम्मानित व्यक्ति, जो ज्यादा विद्वान नहीं थे, वे ही उनके साथ रहे। अतः एवं, चाहे उन्हें किसी भी स्तर पंडित माना जाए वे अनैतिक व्यक्ति थे। अतः वे हिंदुओं के प्रतिनिधि नहीं थे। अब आप कहते हैं कि आप हिंदू कानून परिवर्तित नहीं करना चाहते क्योंकि हिंदू कानून ही पवित्र है? वह हिंदू कानून क्या है? अनैतिक व्यक्तियों की सहायता या सुझाव से अंग्रेजों का बनाया हुआ! यही आपका हिंदू कानून है, तो पीछे कौन-सी पवित्रता है? यही मेरी बात है। अब आप इस मौजूदा विधेयक को उसके अपने गुणों के आधार पर देखें और न्यायसंगत सिद्धांतों के अनुसार मौजूदा संहिता का अवलोकन करें। न्यायसंगत सिद्धांतों के अनुसार ही किसी कानून का अवलोकन आवश्यक है और वह अच्छाई के लिए किया जाता है।

इस संहिता में सर्वप्रथम विवाह और तलाक पर चर्चा की गई है। यदि आप गत दो या तीन वर्षों के दौरान पारित विभिन्न गौण अधिनियमों का अवलोकन कर लें, तो आप पाएँगे कि यह मात्र संहिताकरण है और इसमें नया कुछ नहीं है। आप सांस्कारिक विवाह कर सकते हैं और आप सिविल विवाह भी कर सकते हैं। आप पाएँगे कि हिंदू