हिन्दू संहिता - जारी... - Page 654

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लोग विभिन्न जातियों से विवाह कर लेते हैं, उसके बावजूद वे हिंदू बने ही रहते हैं। आप यह नहीं कह सकते कि वे जाति से बाहर हो गए हैं। अतः, क्या प्रचलन में है, पूर्व तथ्य क्या है_ आप इसे कानून के तौर पर लें। मैं नहीं मानता कि आप यहाँ कोई परिवर्तन कर रहे हैं। न्यायिक सम्बंध-विच्छेद और विवाह की समाप्ति के संबंध में भी असलियत में जाएँः कोई व्यक्ति नपुसंक था, कोई पति दूसरी औरत या रखैल को रखे हुए हैं, कोई एक व्यक्ति हिंदू नहीं रहा, व्यक्ति स्थायी तौर पर पागल हो गया हो, कोई व्यक्ति लाइलाज कोढ़ की बीमारी से ग्रस्त हो गया। मैं अब आपके सामने एक सीधा प्रश्न रखता हूँ। क्या हिंदू श्रुतियों या स्मृतियों के किसी कानून या संदर्भ में कुछ भी ऐसा है, जो इस शर्तों का खंडन करता हो? मैंने मनुस्मृति को देखा और पाया कि इस संबंध में कुछ भी असंगत नहीं है। यदि मेरे माननीय मित्र इसमें कुछ असंगत पाते हैं, तो वे इनमें संशोधन कर सकते हैं। मैं स्मृतियों के विरुद्ध नहीं हूँ और मुझे उन पर गर्व है। मैंने उनका अध्ययन किया है और मैंने उनमें ऐसा कुछ भी असंगत नहीं पाया है। यदि ये शर्तें सामाजिक न्याय के नियमों के अनुकूल है, तो मुझे ऐसा कोई कारण नजर नहीं आता कि आप इसे स्वीकार न करें। क्या आप स्त्रियों के दुश्मन हैं? क्या आप अपनी माँ और पुत्री के दुश्मन हैं? हमारी माँ एक सम्मानीय हस्ती है और हमारी पुत्री हमारे जीवन और संबंधों का अंग है। क्या ऐसा नही है? तब आप क्यों रुदन करते हो कि यह हिंदूस्तान की प्रतिष्ठा गिरायेगा और हिंदू समाज के टुकड़ों में बांटेगा। हमारे धर्म में ऐसा कुछ नहीं है, संस्कृति और हिंदू समाज के आधार पर भी ऐसा कुछ भी नहीं है, जो उक्त स्थितियों के विरुद्ध या उनके प्रतिकूल हो।

अब दत्तकग्रहण का मामला लें। मेरा अपना अनुभव है कि हमारे समाज की प्रगति के इस स्तर पर यह अनावश्यक है और इसका कोई अर्थ नहीं हैं। मनु का एक अध्याय ऐसा है, जो दत्तकग्रहण पर हैः अर्थात् पुत्रविहीन पिता का स्वर्ग में कोई स्थान नहीं है। उस अध्याय का यही सार है। उस समय आर्य, मूल आदिवासियों या गौर-आर्यों का सामना कर रहे थे। अतः यह स्वाभाविक था कि वे अपनी संख्या बढ़ाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने इसे इस तरह पेश किया थाः किसी हिंदू के तीन ऋण होते हैंः एक ईश्वर के प्रति ऋण, (2) ऋषियों के प्रति ऋण, (3) पित्तों के प्रति ऋण। अर्थात् अपनी प्रजाति के प्रति ऋण या प्रजाति की परंपरा को बढ़ाना। जब मनु ने स्मृतियाँ लिखी थीं, तब प्रजाति को बढ़ाना आवश्यक था। ऐसा करना आज आवश्यक नहीं है। आज, इस बात की चिन्ता नहीं कि हमारे बच्चे नहीं हैं दूसरी तरफ चिन्ता इस बात की है कि हमारे पास भोजन व कपड़े नहीं हैं। अगर हमारी संख्या कम है तो हमारे पास ये चीजें बहुतायत में होंगी। इसलिए इस स्तर पर मैं दत्तकग्रहण हेतु कोई तर्क नहीं देखता हूँ। पूजा-अर्पण और ऐसी बातों के पीछे ये यही मंशा थी कि हमारे समाज में दान-पुण्य की भावना बनी रहे और स्वर्ग का रास्ता खुला रहे। किंतु, मानव समाज ने अब इस कदर प्रगति कर ली है और