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प्रावधानों के बारे में विशेष विवेचन नहीं करूंगी। यह बिल्कुल अनावश्यक है। एकता ऐसी चीज है जिसे हम इस देश में चाहते हैं तथा उन हिन्दुओं के लिए एक समान तथा व्यापक संहिता चाहते हैं, जो देश में बहुसंख्यक हैं तथा जो वास्तव में उनकी जरूरत है।
एकपत्नीत्व की बात करने पर, मैं यह पूछना चाहूँगी, क्या इस सदन में अथवा देश में कोई ऐसा व्यक्ति है जो अपनी बहन या अपनी बेटी को उस पुरुष की पहली पत्नी बनाने के लिए गंभीर विचार करेगा, जिसने दुबारा विवाह किया है। वह सही है कि बहुपत्नी का रिवाज अधिक नहीं है, कुल मिलाकर यह स्थिति विरल ही है। परन्तु हाल के वर्षों में हमने देखा है कि बहुपत्नी की प्रथा चलन में आती जा रही है और यह स्थिति भारतीय महिलाओं के लिए बेहद शर्म की स्थिति है। ऐसी महिलाएं भी हैं जो जानबूझकर या स्वेच्छा से ऐसे पुरुषों की दूसरी पत्नियां बनने पर सहमत हुई हैं। मैं यह विचार नहीं करना चाहती कि मुझे इस बात को अधिक स्पष्ट करने की आवश्यकता है कि उन महिलाओं की शिकायतों और दुखद स्थिति को करने के लिए कानून बनना चाहिए, जो ऐसे पुरुषों की पहली पत्नी हैं।
अब मैं अन्तरजातीय विवाह और सगोत्र विवाह की बात प्रारम्भ करती हूँ। हमारे संविधान के सैद्धांतिक अधिकारों में हमने कहा है कि जाति और लिंग के कारण तथा अन्य बातों के विषय में सभी प्रकार के भेद-भाव छोड़ देने चाहिए। वास्तव में अन्तरजातीय विवाह जो कानून के अनुसार भी स्वीकार्य है, इस दिशा में पहला कदम होगा।
माननीय उपाध्यक्षः जाति छोड़ी जा सकती है_ पर लिंग कैसे छोड़ा जा सकता है?
श्रीमती रेणुका रेः मैंने कहा था कि जाति और लिंग के कारण भेदभाव।
माननीय उपाध्यक्षः माननीय सदस्य अपना भाषण जारी रखें।
श्रीमती रेणका रेः इस संहिता में तलाक के उपबंध पर ध्यान देते हुए मैं इस बात से समहत हूँ कि इस उपबंध में प्रतिबंधित शर्तें हैं। घर समाज का केंद्र है और मैं इस बात में विश्वास करती हूँ कि विवाह के लिए प्राथमिक कारण यह है कि वह बच्चों की सुरक्षा के लिए है और उसमें तलाक तुच्छ कारणों पर नहीं दिए जाने चाहिए। परन्तु दारुण दुःख के वास्तविक मामलों में हम तलाक की व्यवस्था कर सकते हैं। सन् 1943 से, जब प्रथम बार विवाह विधेयक प्रस्तुत किया गया था, मुझे दर्जनों पत्र मिले थे और अनेक लोग मुझसे मिलने आए थे, अपनी बेटियों के साथ जिन्होंने मुझे दिखाया था कि कितनी बड़ी और कितनी भयानक त्रासदी है जिसे महिलाओं को भुगतना पड़ता है। जब तक ऐसी व्यवस्था नहीं की जाती दोनों पुरुषों और महिलाओं के लिए तब तक वास्तविक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होगी। श्रीमान, तो कुछ समय के लिए मैं इस विषय से अलग हटना चाहती हूँ। कारण यह है कि विपक्ष के बारे में मैंने कहा है और