हिंदू विवाह वैधता विधेयक - Page 67

52 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उसी विपक्ष के लोग उन अनेक महिलाओं को जाकर बता रहे हैं जो कानून अथवा इस संहिता के उपबंधों को नहीं समझतीं कि उनकी अपनी महिलाएं ऐसे कानून को लाने का प्रयास कर रही थीं, जिनके द्वारा उनका तलाक हो जाएगा। वे यह महसूस नहीं करते कि यह केवल अनुमत कानून है और केवल दुखी व्यक्ति है। तलाक का दावा कर सकता है और उसके लिए निर्वाह-धन की व्यवस्था भी की जाती है। इन बातों का प्रायः उल्लेख नहीं किया गया है। सैंकड़ों सार्वजनिक सभाओं में ये मामले मेरे समक्ष लाए गए हैं और मैंने इस बात को स्पष्ट किया है और मेरा विचार है कि इस विधानसभा की महिला सदस्य भी यही बात कह सकती हैं।

संयुक्त मिताक्षर परिवार की बात प्रारम्भ करने पर मैं यह नहीं सोचती कि मेरे लिए इस बात की आवश्यकता है कि माननीय विधि मंत्री ने इस विषय पर जो कुछ कहा है उस विषय में एक शब्द भी जोड़ने की आवश्यकता महसूस करूं। उन्होंने इस बारे में विस्तृत विवेचन कर दिया है।

जहां तक सम्पत्ति के उत्तराधिकार में बेटी का संबंध है इस पर विरोधीमत के नेताओं ने ध्यान केंद्रित किया है। यह स्थिति स्वाभाविक है क्योंकि यही स्थिति सिद्ध करती है कि यह अत्यधिक कट्टरता नहीं है और न ही अन्धा दूराग्रह है, परन्तु यह निहितार्थ है, जो हमारे सम्मुख है। माननीय विधि मंत्री ने पहले ही इस विषय पर बात की है, परन्तु मुझे इस बारे में एक-दो बातें करनी हैं। किसी महिला की आर्थिक प्रतिष्ठा तभी स्थापित हो सकती है, जब उत्तराधिकार में बेटी के अधिकार को मान्यता दी जाए। यह एक ऐसा विचार बिंदु या जिसे कल मेरे माननीय मित्र सेठ गोविंददास ने प्रस्तुत किया था। उन्होंने कहा था (मैं नहीं जानती कि इसमें उनका कितना विश्वास था) उन्होंने कहा ‘‘हमें उत्तराधिकार क्यों चाहिए?य् निश्चय ही मैं इस बात से सहमत हूँ कि समय आएगा और आना ही चाहिएµयदि हम सभी के लिए अवसर की समानता चाहते हैं और इसमें विश्वास करते हैं। यदि हम चाहते और विश्वास करते हैं कि सम्पत्ति की असमानता समाप्त हो जाए। समानता में अब से सब को हो, यदि हम विश्वास करते हैं कि सम्पत्ति का समय आना चाहिए, जब उत्तराधिकार में प्राप्त सम्पत्ति अलग हो। परन्तु इस समय तक यदि बेटी और बेटे में अन्तर है, तब इस अन्तर का अर्थ यह है कि प्रतिष्ठा में अन्तर है। यह बेटी की प्रतिष्ठा है, जिसको मान्यता दी जानी है। वह बेटी के रूप में, एक महिला के रूप में स्वाभाविक उत्तराधिकारी है। यह केवल सैद्धान्तिक दृष्टि से ऐसा नहीं है, जिसका मैंने उल्लेख किया है। हम निर्वसीयती उत्तराधिकार के बारे में बताते हैं और यह अधिक स्वाभाविक है कि पिता अपनी बेटी को दाय से वंचित नहीं करेगा, जबकि एक ससुर ऐसा करेगा। इस तथ्य के बावजूद जैसा मेरे माननीय मित्र पंडित भार्गव ने कहा था। संयुक्त परिवार में महिला के अधिकारों ने जो गत वर्षों में अधिक उपयोगी उद्देश्य की पूर्ति की है, वे वर्तमान परिस्थितियों में हाल के वर्षों में ऐसे नहीं हैं। मेरी माननीय सहेली सुचेता कृपलानी ने कल एक बात कही थी, जिसकी मैं पुष्टि करना चाहूँगी। वे महिलाएं अथवा पुरुष जो सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जानते हैं कि