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श्री अरुण चंद्र गुहा (पं. बंगालः सामान्य)ः हमें अब सूचित किया जाए कि सदन कब स्थागित किया जाएगा। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो हमें अपने कामकाज की व्यवस्था में कठिनाई होगी।
माननीय अध्यक्षः इस संबंध में, मेरे द्वारा एक दिन स्पष्ट की जा चुकी है। मैंने माननीय प्रधानमंत्री से सूचना दिए जाने का अनुरोध किया था और उन्होंने कहा था कि वह यह एक अथवा दो दिनों तक और चल सकती है। उनके लिए भी यह संभव नहीं था कि इस बारे में निश्चित रूप से कह सकें, क्योंकि कुछ अत्यावश्यक कार्य आ सकते हैं, जिन्हें वे चर्चा में व्यवधान दिए बिना प्रस्तुत करना चाहे। इसलिए, ऐसे मामले भी सदस्यों के पास आते ही हैं। परंतु मैं कहना चाहता हूँ कि हम 9 अप्रैल के बाद इस पर चर्चा के लिए नहीं बैठेंगे।
श्री अरुण चंद्र गुहाः ऐसी स्थिति में अत्यावश्यक मामले पहले निपटाए जा सकते हैं।
माननीय अध्यक्षः अत्यावाश्यकता के अनुसार, यह सहमति का मामला बन जाता है।
मौलाना हसरत मोहानी (यू.पी.ः मुस्लिम)ः डॉ. अम्बेडकर की इस कठिनाई के निवारण हेतु मैं एक सुझाव देना चाहूँगा। मेरा मानना है कि किसी विधायी उपाय को, जिसमें सामाजिक सुधार शामिल हैं, सरकारी कामकाज का भाग नहीं बनाया जाना चाहिए। मैं समझता हूँ कि किसी प्रकार इस विधेयक में श्रीमती दुर्गाबाई या श्रीमती रेणुका रे द्वारा प्रस्तुत सामाजिक सुधार भी शामिल हैं।
इस तरह इस बिल को अनिच्छुक जनता पर थोपना नितांत अनुचित है। अतः, मैं अपने माननीय मित्रों को आमंत्रित करता हूँ कि वे अपने पूरे उत्साह और इस बीत की अनुभूति के साथ कि विवेक, वीरता का ही श्रेयष्कर भाग है, के मद्देनजर इस विचाराधीन विधेयक को स्थगित कराएँ और सरकारी विधेयक के रूप में वापस करा दें।
बाद में किसी सामान्य सदस्य द्वारा जनमत के आधार पर सामाजिक सुधारों वाले इस प्रकार के विधेयक को प्रस्तुत करा सकते हैं।
माननीय अध्यक्षः माननीय सदस्य को इस विषय पर आगे बहस करने की आवश्यकता नहीं है। यह काफी है कि उन्होंने अपना सुझाव दिया है।
श्री मुहम्मद इस्माइल खान (यू.पी.ः मुस्लिम)ः जैसा, माननीय मंत्री ने सदन को बताया है, इस बिल की प्राथमिकता का निर्धारण मंत्री मंडल समिति द्वारा किया गया है। यकीनन, हमें उनसे यह जानने का हक है कि क्या वे इस विधेयक को प्राथमिकता पर रखे जाने के लिए इच्छुक हैं अथवा नहीं हैं?