648 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अतः एवं मूल बिल के धारा III -ए में महत्वपूर्ण उपबंधों के साथ गंभीर चूक की गई है। मैंने इनका हवाला दिया है, क्योंकि मैं अलग-अलग किए गए परिवर्तनों पर ही नहीं अपितु इन परिवर्तनों के समेकित प्रभावों से भी परिचित कराना चाहता हूँ।
इसके बाद कुल बिल का भाग IV जो विवाह और तलाक से संबंधित है, वह विभागीय और अंतिम बिल के भाग II के समतुल्य है।
मैं उनके केवल प्रमुख मुद्दों पर चर्चा करूंगा। उनमें विवाह से संबंधित धाराएँ पूर्णतः और समूल परिवत्रित कर दी गई हैं_ उन पर कुछ विस्तृत चर्चा अपेक्षित है। सांस्कारिक विवाह के संबंध में हिंदू समाज में जो रीतियाँ प्रचलित हैं वे सुविदित हैं। मूल बिल में जिन वैवाहिक पद्धतियों को छोड़ दिया गया है, वे रीति-रिवाजों एवं सामाजिक प्रथाओं के अनुसार लागू मानी जा सकती हैं। मूल बिल में विवाह की वैधता की शर्त हेतु सांस्कारिक विवाह के पंजीकरण का कोई प्रावधान नहीं था। मैं यह बताने का प्रयास कर रहा हूँ कि विभागीय विधेयक में ही ऐसे परिवर्तन प्रस्तुत किए गए हैं। वे अनजाने में हो सकते हैं, किंतु मुझे परिवर्तन ऐसे प्रतीत होते हैं,ं कि विवाह तब तक वैध नहीं होंगे जब तक इसे पंजीकृत न किया गया हो। वहाँ पंजीकरण वैकल्पिक नहीं है जैसा मुसलमानों के मामले में होता है। वहाँ विभागीय विधेयक द्वारा पुरानी औपचारिकताओं में हस्तक्षेप किया गया है और वहाँ विवाह की वैधता तभी मानी जाएगी, जब पंजीकरण किया गया हो। अन्यथा, मैं सिद्ध करने का प्रयास करूँगा कि विवाह अवैध हो सकता है।
मूल विधेयक का भाग IV इस विषय से संबंधित है। धारा 2 में उल्ल्खित था कि हिंदू विवाह दो प्रकार का होता है-यानी सांस्कारिक विवाह एवं सिविल विवाह। यहाँ सिविल विवाह फिलहाल मेरा मुद्दा नहीं है, क्योंकि मूलतः ‘हिंदू विवाह’ के दो रूप हैं-सांस्कृतिक विवाह तथा सिविल विवाह, मूल विधेयक में यही प्रावधान था। हिंदू विवाह के सुपरिचित रीति-रिवाजों एवं अपेक्षाओं पर ये दोनों रूप निर्भर रहते थे और, इस हेतु कोई पंजीकरण कराए जाने की आवश्यकता नहीं थी। अतः सदन को विभागीय विधेयक में समतुल्य धाराओं पर सहर्ष विचार करना होगा। मूल विधेयक मात्र यह कहता है कि सांस्कारिक विवाह, विवाह के कई रूपों में एक प्रकार का विवाह है। इसकी विस्तृत रूपरेखा को इसे पक्षों के विवेक पर छोड़ दिया गया है।
विभागीय विधेयक की धारा 6 में जो अंतिम बिल की धारा 6 के समतुल्य भी हैं, निम्नलिखित प्रावधान किए गए हैं ‘‘यहाँ जो व्यक्त किया गया है, के अलावा हिन्दुओं के बीच कोई भी विवाह तब तक वैध नहीं माना जाएगा, जब तक इस भाग के उपबंधों के अनुसार इसे सांस्कारिक या सिविल विवाह के तौर पर अनुष्ठापित न किया गया हो।