हिन्दू संहिता - जारी... - Page 665

650 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

का विवरण इस रजिस्टर में दर्ज नहीं हो तो भी विवाह वैध माना जाता किंतु, पंजीकरण होने से विवाह ‘प्रमाणिक सबूत’ बन जाता और किसी न्यायालय में प्रविष्टि की प्रमाणित प्रतिलिपि को न्यायिक सूचना माना जा सकता था। लेकिन विभागीय विधेयक की समकक्ष धारा में यह इस तरह उल्लिखित हैः

‘‘किसी भी सांस्कारिक विवाह के प्रमाण को सुविधाजनक बनाने के उद्देश्य से प्रांतीय सरकार द्वारा उपलब्ध नियमों के द्वारा (और यहां यह देश इस प्रकार समाप्त होता है) (क) ऐसे विवाह से संबंधित विवरण को हिंदू विवाह प्रमाणपत्र पुस्तिका में दर्ज किया जाएगाख्...,’’

वस्तुतः यह बाध्यता यहीं पर पूरी नहीं हुई है, बल्कि यहाँ से केवल शुरू हुई है।

श्रीमान् इसके बाद, हम विभागीय विधेयक की धारा (बी) पर आते हैं। मूल विधेयक की धारा 6 की उप-धारा (3) में उल्लिखित हैः ‘‘इसी प्रकार की प्रविष्टि किए जाने की कोई बाध्यता नहीं होगी।’’

श्रीमान् मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि विभागीय बिल की समतुल्य भाषा पर विचार किया जाए। मैं, आपकी अनुमति से मूल विधेयक दोहराना चाहता हूँ- ‘‘इस प्रकार की प्रविष्टि किए जाने की कोई बाधयता नहीं होगी।’’

श्री महावीर त्यागीः इसक अर्थ क्या यह है कि विवाहित व्यक्तियों को रजिस्ट्रर के कार्यालय जाना होगा?

श्री नजीरुद्दीन अहमदः मूल विधेयक के अनुसार इस प्रकार की प्रविष्टि किए जाना अनिवार्य नहीं है। यह सुस्पष्ट है। किंतु हम विभागीय विधेयक के समतुल्य उपबंधों पर विचार करें।

‘‘इस प्रकार की प्रविष्टि कराना अनिवार्य है।’’

श्री जसपत राय कपूर (यू.पी. सामान्य)ः मैं इस विषय पर बाद में आऊंगा। उसमें ‘‘किस स्थान पर’’ भी उल्लिखित है। वे बहुत ही असुविधाजनक स्थान हैं।

इसलिए मूल कानून को नियमानुसार सबूत को सुविधाजनक बनाने के उद्देश्य से पुस्तिका में विवाह का विवरण दर्ज किया जा सकता है। किंतु प्रविष्टि कराना अनिवार्य नहीं होगा। परंतु विभागीय बिल की संशोधित धारा में ब्यौरा दर्ज किया जाएगा तथा ऐसे मामलों में प्रविष्टियाँ कराना अनिवार्य होगा।

इसके पश्चात्, और भी है। यानी विभागीय विधेयक की धारा 9 की उप-धारा (2) के अनुसार निम्न निर्देश है-