हिन्दू संहिता - जारी... - Page 668

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और हमारे देश की इस स्थिति में विशेषकर पिछड़ी जनता के लिए, यह प्रावधान नितांत अनीतिकर और अनुपयोगी ही है।

श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः श्रीमान् यदि आप मुझे अनुमति दें, तो...

माननीय अध्यक्षः इस बहस के पक्ष-विपक्ष पर कोई चर्चा न की जाए।

श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः ऐसा मैंने केवल स्पष्टीकरण के उद्देश्य से चाहता हूँ।

माननीय अध्यक्षः यदि हम स्पष्टीकरण एवं अगामी चर्चा में पड़ते हैं तो यह कभी समाप्त न होने वाला भाषण हो जाएगा। मुद्दा यह है कि माननीय सदस्य अपनी व्याख्या कर रहे हैं। पर मैं इस तथ्य की ओर सबका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ कि इससे विवाह की वैधता प्रभावित नहीं होगी। यदि वे फिर भी इस बहस को जारी रखना चाहते हैं, तो उन्हें ऐसा करने दें। इससे उनका भाषण छोटा हो जाएगा।

श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः श्रीमान्, यदि आप मुझे अनुमति देते हों, तो मैं केवल एक बात पर उनसे स्पष्टीकरण चाहता हूँ यह धारा इन शब्दों से शुरू होती है

‘‘किसी सांस्कारिक विवाह के साक्ष्य को सुविधाजनक बनाने के लिएख्...,’’

माननीय अध्यक्षः मैं इस बात से पूर्ण भिज्ञ हूँ। पर मैं इसे उनके समक्ष उस तरह प्रस्तुत नहीं करूँगा। मैं कहना चाहता हूँ कि इससे किसी भी तरह विवाह की वेधता प्रभावित नहीं होती है। लेकिन हम किस प्रकार उन्हें मनवा सकते हैं? आइए, अब हम उनकी ओर मुखातिब होते हैं। यही संक्षिप्त तरीका है जिससे हमारे समक्ष उनके भाषण का समायन हो सकेगा। अन्यथा, हमें उनके भाषण के प्रत्येक मांग पर चर्चा करनी होगी। जब माननीय सदस्य-गण उनके भाषण को शांतिपूर्वक सुन रहे हैं तो इसका आशय यह नहीं है कि वे उनके कथनों से भी सहमत हैं। अतः अब वे अगली बात पर आगे बढ़ सकते हैं।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः मैं अब विभागीय विधेयक की धारा 8 पर आता हूँ।

माननीय अध्यक्षः यह बेहतर होगा कि माननीय सदस्य सदन के समक्ष अंतिम विधेयक के संदर्भ प्रस्तुत करें और उसके परिवर्तनों का जिक्र करें। अन्यथा, मैं उनका अनुसरण नहीं कर पाऊंगा, क्योंकि वे एक साथ तीन या चार विधेयकों का हवाला दे रहे हैं।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः मैं मूल विधेयक से शुरू करता हूँ। यकीनन, यह अंतिम विधेयक की धारा 8 भी है। मूल विधेयक को भाग IV की धारा 4 के अनुसारः

‘‘सांस्कारिक विवाह रीति-रिवाजों एवं संबंधित पक्षों के रीति-रिवाजों/परंपराओं के अनुसार अनुष्ठापित किए जा सकते हैं।’’