654 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
लेकिन संशोधित मसौदा की धारा 8, उप-धारा (1) के अनुसारः
‘‘सांस्थारिक विवाह तब तक संबंधित पक्षों पर बाध्यकारी और पूर्ण नहीं होंगे जब तक ऐसे विवाहों के लिए अनिवार्य रीति-रिवाजों तथा पक्षों के रीति-रिवाजों के अनुसार उन्हें अनुष्ठापित न किया गया हो।’’
श्रीमान्, मेरे अनुसार यह बहस का मुद्दा नहीं है। ऐसा भूलवश हुआ है। किंतु मैं यह कहना चाहता हूँ कि मैं किसी आवश्यक तर्कपूर्ण परिणाम के लिए इस व्याख्या पर जोर नहीं देना चाहता हूँ। लेकिन मेरा मानना है कि इसे शायद अनजाने में लाया गया है और यहाँ संदेह की भी संभावना है, जैसा विवाहों की वैधता के संबंध में भी देखा गया है। मैं प्रत्येक अधिवक्ता की भावना को समझता हूँ? जज और राजनेता इस पंजीकरण के आधार पर विवाह की अवैधता के खिलाफ होंगे। किंतु यहाँ राजनीति भी है_ अतः यह अवधारणा पूर्णतः वैध और सांवैधानिक ही होनी चाहिए।
व्याख्या क्या है? यदि आप इन नए उपबंधों के अनुसार विवाह संपन्न नहीं करते, तो विवाह अवैध होगा। नतीजा यह है कि क्या हम उपबंध के औचित्य से सहमत हैं या नहीं? मेरी सहज बुद्धि कहती है कि जब तक विवाह का ब्यौरा रजिस्ट्रर में दर्ज नहीं किया जाता, तब तक विवाह अवैध माना जाएगा। मैंने यह सदन के विचारार्थ प्रस्तुत किया है।
मैंने पहले भी प्रविष्टियाँ किए जाने के संबंध में उपबंधों का हवाला दिया है कि इनकी प्रविष्टियाँ कराना अनिवार्य हो जाएगा।
माननीय अध्यक्षः ऐसा आपने कह दिया है_ अतः इसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः क्या इसे संबंधित पक्षों अथवा पंजीयन अधिकारी के लिए अनिवार्य कर दिया है?
माननीय अध्यक्षः यह विस्तृत चर्चा का विषय है। फिलहाल, हमें इस पर जाने की आवश्यकता नहीं है।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः मैं, अब अल्पसंख्यक और अभिभावकता से संबंधित मूल विधेयक को भाग V पर आता हूँ। इसलिए धारा 3 को अंतिम एवं विभागीय विधेयक से पूर्णतः हटा दिया गया है। मुझे पर धारा की तह में जाने की आवश्यकता नहीं है, किंतु यह एक महत्वपूर्ण धारा है, जिसे छोड़ दिया गया है। यहाँ एक गंभीर परिवर्तन किया गया है। यहाँ अन्य महत्वपूर्ण परिवर्तन भी किए गए हैं, पर मैं इस विषय पर कुछ नहीं कहूँगा।