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यदि इस देश के अनाथ आश्रमों में रहने वाली महिलाओं की दशा का विश्लेषण। यह सिद्ध करेगा कि इनमें कितनी महिलाएं हैं जो संयुक्त परिवार से बाहर कर दी गई हैं। उन्हें
खुद को चलाने का प्रशिक्षण दिए बिना, अपने घरों से बाहर कर दिया गया है, शर्मनाक जीवन बिताने के लिए विवश होना पड़ा है। यह ऐसा प्रश्न है कि जिससे हिंदू समाज को सामना करना है। मैं इस बात से आश्वत हूँ कि जिन व्यक्तियों ने हिंदू कानून पारित किया है, उन्होंने कभी भी ऐसी स्थिति के बारे में सोचा नहीं होगा।
महिलाएं वंश की माताएं हैं, अतः कोई भी वंश तब तक आगे नहीं बढ़ सकता जब तक महिलाएं उत्तरदायी माताएं और सचेत नागरिक न हो सकें। शिक्षित महिलाओं के बारे में काफी प्रचार किया गया है। यह कहा गया है। कुछ थोड़ी-सी शिक्षित महिलाएं यह कहा गया हिंदू संहिता चाहती हैं, अथवा उसमें ठहरते हुए धीमे सुधार चाहती हैं। श्रीमान, जहां तक महिलाओं का संबंध है, संख्या थोड़ी-सी होनी चाहिए क्योंकि इस देश में शिक्षित तत्वों का अनुपात 15 प्रतिशत है और महिलाएं जो शिक्षित है 3 या 4 प्रतिशत हैं। अतः जहां तक महिलाओं का संबंध है, वह थोड़ी-सी ही होना चाहिए, परन्तु उनके पीछे केवल आज नहीं, अपितु गत दशाब्दियों से बड़ी संख्या में प्रबुद्ध और प्रगतिशील पुरुष खड़े हुए हैं। यह इस देश की महिलाएं नहीं हैं जो अकेले इस तथ्य के लिए उत्तरदायी हैं कि कोई नारी मताधिकार आंदोलन या नारी विमर्श-आन्दोलन नहीं है। इस देश में बल्कि इसका कारण यह है कि गत दशाब्दियों से उनके नेतृत्वकर्ता पुरुष रहे हैं। आज भी वही स्थिति विद्यमान है और मुझे विश्वास है कि सदन के बहुमत के पीछे वे ही हैं। यह देश के शिक्षित महिलाओं की माँग नहीं है, अपितु यह मांग उन सभी की है जो चाहते हैं कि भारत की प्रगति हो। बिना महिलाओं के सचेत नागरिक में सही स्थान प्राप्त किये हुए, समाज, नागरिक, यह संभव नहीं होगा कि हम प्रगति कर सकें।
श्रीमान, यह सर्वविदित है कि दासों ने भी उस समय विरोध किया था, जब उनकी दासता की बेडि़यां काट दी गई थीं। यह भी तथ्य है कि पददलितों ने स्वतंत्रता के लिए आपत्ति की है। इससे भी क्या है हमारे ही देश में ब्रिटिशों द्वारा यह माना गया था कि वे केवल नीच कांग्रेस विद्रोही ही थे, जो स्वतंत्रता चाहते थे लेकिन अधिकांश लोग इस बात के इच्छुक थे कि दयनीय दासता में ही संतुष्ट रहा जाए। यदि आज आप महिलाओं के बीच दयनीय संतोष की बात कहते हैं, तो यह सत्य है और यह नितांत सत्य है कि अभी तक अनेक महिलाएं सचेत नहीं हुई हैं। परन्तु क्या यही कारण है कि आप उन्हें नहीं जगायेंगे, कि वे उस संयुक्त उद्यम में पुरुषों की तुलना में समान न हों, पर हमारे सामने आज नए भारत के निर्माण के लिए स्वतंत्रता के वातावरण में हैं? मैं पूछती हूँ, क्या कोई है जो यह महसूस करता है कि इस देश में महिलाओं के बिना आगे बढ़ना संभव है?
निष्कर्ष निकालने से पूर्व मैं एक-दो शब्द उसके बारे में कहना चाहूँगी, जो हमारे माननीय मित्र पंडित ठाकुर दास भार्गव ने कहा है। मैं यह अवश्य कहूँगी कि मैं उनके