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श्रीमान्, इस पुस्तक में वहाँ का पूरा इतिहास दिया गया है। जब वहाँ कोई मरता है। वह एक चादर या कुछ कपड़े या एक घोड़ा या ऊंट या कुछ अलग तरह का समान छोड़ जाता है। और पुराने अरबी रीति-रिवाजों के अनुसार उन्हें निकट परिजनों के मध्य बांट दिया जाता है। लेकिन वहाँ इससे कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती। वहाँ कुरान के अनुसार किसी व्यक्ति विशेष को कोई विशेष हिस्सा नहीं दिया जाता है। वहाँ उत्तराधिकार का मौजूदा स्वरूप पुराने अरब के रिवाजों से ही लिया गया है, जिसे मुस्लिम विद्वानों विशेषकर बड़े विद्वानों के मुस्लिम कानून, अबू हनिफा तथा अन्य द्वारा संशोधित और परिवर्तित किया गया है।
मैं इसमें विस्तार से नहीं जाना चाहता हूँ मेरे कहने का अभिप्राय मात्र यह है कि मुस्लिम दृष्टिकोण इतिहास का मामला है। चाहे वह सही हो या गलत, यहाँ वह मुद्दा नहीं है। अब तथ्य यही है कि मैं हिंदू पुत्री को हिस्सा देने के विरुद्ध हूँ। इसलिए नहीं कि मैं अपनी हिंदू बहनों को देने का अनिच्छुक हूँ या मैं मुस्लिम बहनों को क्यों देता हूँ। यहाँ जो किसी मुस्लिम के साथ अच्छा है, वह उनके पुराने रिवाजों और भावनाओं पर निर्भर है। इसी प्रकार किसी हिंदू के लिए क्या अच्छा है वह हिंदुओं के पुराने रीति-रिवाजों एवं भावनाओं पर निर्भर करता है। जब अरबों ने मध्य देशों पर विजय पाई, तो वहाँ दिक्कतें भी पैदा हुईं क्योंकि उन्होंने अचल संपत्ति भी प्राप्त कर ली थी। यह इतिहास का विषय है कि उन्हें भी बड़ी संख्या में भागीदारों को सम्पत्ति का उत्तराधिकार देने में कठिनाई महसूस हुई, जिससे विघटन को बढ़ावा मिला। इसके बाद वक्फ की व्यवस्था आई, जिसे हम आज देखेते हैं। यह व्यवस्था पवित्र पुस्तक के कुछ पैरों में मुस्लिम दूष्टगणों द्वारा व्यक्त विचार पर आधारित थी और तभी उन्होंने वक्फ विकसित करने का प्रयास किया। उसी कारण वे अब बंटवारे के बुरे प्रभाव को प्रभावहीन कर देना चाहते हैं। भारत में वक़्फ़ के कानून को भारतीय अदालातें और विशेषकर प्रिवी काउंसिल द्वारा और विकसित किया गया और इसी से काफी हद तक वक्फ कानून के घरेलू उद्देश्यों के लागू करना विफल हो गया। यह सर्वविदित है कि 1913 में, श्री जिन्ना सदन में एक विधेयक लाए और उन्होंने एक अधिनियम-वक्फ अधिनियम पारित करवाया, जिससे उन वक़्फ़ों की वैधता को मान्यता मिल गई, जो मुस्लिमों के लिए बराबर काम कर रहे थे। यह बंटवारों के अत्यन्त सूक्ष्म दुष्प्रभावों को निष्फल करने का एक प्रयास था। सम्पत्ति के बंटवारे के लेकर यह मुस्लिम दृष्टिकोण सर्वथा भिन्न था। एक मुस्लिम की पहचान उसका एकल व्यक्तित्ववादी होना है। वास्तव में, अत्यल्प बंटवारे ने उन्हें अलग-अलग रहने की प्रवृत्ति की ओर अग्रसर किया। भाई-भाई लम्बे समय तक संयुक्त परिवार में नहीं रहते_ वे जल्दी अलग हो जाते हैं। हमने हाल ही के भारतीय इतिहास में बड़े पैमाने पर अलग-अलग रहने की प्रवृत्ति देखी है। अतः, एक मुस्लिम का दृष्टिकोण अलग रहने का होता है, जबकि एक हिन्दू का दृष्टिकोण संयुक्त परिवार के दृष्टिकोण वाला होता है। हिन्दू एक संयुक्त परिवार के रूप में रहता है। परिवार एक इकाई की तरह होता है और वे एक परिवार के दृष्टिकोण महिला के अधिकारों का