658 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पक्ष लेते हैं। मुस्लिम दृष्टिकोण इससे भिन्न है। वस्तुतः हिन्दू परिवार की एक महिला, पुरुषों के समकक्ष ही होती है, अतः असमानता का जो प्रश्न यहाँ उठाया गया है, वह प्रश्न ही नहीं उठता। वहाँ महिलाएँ हर तरह से पुरुषों के समान होती हैं, क्योंकि हिन्दू परिवार की अर्थव्यवस्था में प्रत्येक महिला की मान्य भूमिका होती है। यह प्रश्न के दृष्टिकोण का हल है। यद्यपि मैं इस सदन के किसी भी मामले पर कानून बनाने के प्राधिकार का कोई प्रश्न नहीं कर रहा, मैं केवल चर्चा किए बिना इस कानून के लिए सदन के अंतर्गत हिन्दू संस्कृति रही है उसके ब्यौरों पर ही प्रश्न करूंगा। अतः एक हिन्दू विधवा की स्थिति पर भी उसी नजरिए से विचार करना चाहिए और यदि पर्याप्त विचार-विमर्श के बाद वह प्रतीत होता है कि कोई व्यवस्था जीर्ण-शीर्ण हो चुकी है, तो यह हिन्दू समाज का दायित्व है कि वह उसे बदले। यह मेरा दायित्व नहीं है कि मैं इसे बदलूं। मैं केवल कुछ तथ्यों को उजागर कर सकता हूँ, जो विधायिका के एक सदस्य के रूप में मेरे मस्तिष्क में आते हैं इसमें मेरा मत नहीं चलेगा, इसमें बहुमत का मत काम करेगा। मेरा कर्तव्य है कि मैं अपने ध्यान में आने वाले तथ्यों को प्रस्तुत करूं। अतः मैं कहता हूँ कि हिन्दू कानून महिलाओं के साथ गैर-न्यायिक नहीं है। यह कानून महिला को परिवार का एक हिस्सा मानते हुए पूर्ण न्याय करता है, जहाँ उस परिवार में महिला की भी भूमिका होती है। वस्तुतः इस विधायिका में हम विभिन्न भूमिकाएं अदा करते हैं। यहां असमानता और भेद-भाव का कोई प्रश्न नहीं है। हमें सभी भूमिकाएं अदा करनी होती हैं। इन परिस्थितियों में मेरा कहना है कि इस दृष्टिकोण से हिन्दू महिलाओं की स्थिति पर विचार-विमर्श किया जाना चाहिए। मुस्लिमों में बँटवारे का मुद्दा बहुत दूर हो चुका है। एक पुत्री का हिस्सा परिवार में कैसे विवाद पैदा कर देता है, विचारणीय विषय है। जैसे ही किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, जिसके परिवार में पुत्र और पुत्रियां दोनों हों, वहां पुत्रियों तत्क्षण अपने हिस्से पा लेती हैं। उनका परिवार होता है, और अधिकाशं मामलों में वे अन्य परिवारों मे चली जाती हैं। वास्तव में, मुस्लिम समाज में अन्तर-जातीय विवाह बँटवारे के दुष्प्रभावों को कम करने के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। एक प्रावधान यह भी है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी सम्पत्ति किसी बाहरी व्यक्ति को हस्तांतरित कर देता है, तो मूल भागीदार को यह अधिकार दिया गया है कि वह मूल्य चुका कर उस हिस्से को पुनः खरीद सकता है। किन्तु जैसा कि प्रत्येक वकील जानता है कि किसी परिकल्पना के लिए एक मुकदमा दायर करना कई विधिक कठिनाइयां पैदा करता है और वे शायद ही जीत जाते हैं। इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए वक्फ एक अन्य प्रयास है। एक मुस्लिम पुत्री को मिलने वाला हिस्सा पारिवारिक सम्पत्ति को सुदृढ़ करने में सहायक नहीं है।
श्री तजामुल हुसैनः मैं यहां बाधा नहीं पहुंचाना चाहता, किंतु चूंकि यह एक मुस्लिम कानून की बात है, मेरी इसमें रुचि है। मैं अपने माननीय मित्र से जानना चाहता हूँ कि क्या उन्होंने मुस्लिम कानून के अंतर्गत सृजित उत्तराधिकार के कानून का अनुमोदन नहीं किया है?