हिन्दू संहिता - जारी... - Page 674

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श्री नजीरुद्दीन अहमदः मैं यह कहना चाहूंगा कि यहाँ यह प्रश्न ही नहीं उठता।

श्री तजामुल हुसेनः अध्यक्ष महोदय यह बता सकते हैं कि यह प्रश्न उठता है अथवा नहीं?

श्री नजीरुद्दीन अहमदः तो भी, मैं इस पर कोई विवाद नहीं खड़ा करूंगा। मुस्लिम परिवार कैसे बिखरता है और कैसे पृथक होता है, यह हमारे लिए लम्बे अनुभव का मुद्दा है, जैसा कि मेरा विश्वास है और आपके जैसे वकीलों का भी। जब एक पुत्री का विवाह होता है, कुछ समय के लिए परिवारिक सौहार्द उन्हें एक साथ रखता है, परन्तु एक समय आता है जब पुत्री अपने पिता के घर आती है और पुत्री एवं भाई की पत्नी के बीच गलत -फहमी उत्पन्न हो जाती है। पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादातर गैर-जरूरी मामलों पर भिन्न मत रखती हैं। वे अधिक संवेदनशील होने के कारण भी भिन्न होती हैं।

श्री महावीर त्यागीः आप महिलाओं की निन्दा कर रहे हैं।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः यह निन्दा करने वाली बात नहीं है। यह उनका चरित्र-चित्रण है। महिलाओं की संवेदनशीलता प्रवृत्ति उन्हें ज्यादा आकर्षक, अधिक रुचिकर और अधिक प्रिय बनाती है। यदि महिलाएं भी हमारी तरह कठोर हृदय, शक्तिशाली और कठोर होतीं तो जीवन असंभव हो गया होता। वस्तुतः यह महिलाओं की प्रवृत्ति की सुदंरता ही है कि वे पुरुषों से इतनी भिन्न हैं। यह दो भिन्न प्रकारों का संगम ही है, जो जीवन को सहनीय और आनंददायक बनाता है। अतः मैं जो टिप्पणी कर रहा था, उसमें निन्दा जैसी कोई बात नहीं थी।

जब पुत्री अपनी भाभी से नाराज हो जाती है तो वह अपने पति के पास वापस जाती है और कहती है ‘‘मैं अपना हिस्सा चाहती हूँ।’’ तब देर-सवेर समस्या शुरू होती है। ऐसा हर घर में होता है। बहन का पति अपने सालों के पास आता है और एक हिस्सा मांगता है। और जब हिस्से के लिए मना किया जाता है, तब वह अपना हिस्सा अपनी पत्नी के भाई को बेच देना चाहता है। वह भाई वास्तव में मांगी गई पूरी कीमत देने के लिए इच्छुक नहीं होता अथवा सक्षम नहीं होता, तो वह व्यक्ति गांव में दूसरे व्यक्ति के पास जाता है और छोटी-सी राशि देकर भी अपनी सम्पत्ति उसे बेच देता है-और इस वायदे के साथ बेचता है कि समस्या की समाप्ति पर और राशि दी जाएगी। और तब नए अधिकार कुछ वास्तविक प्रदर्शन शुरू हो जाता है। यानी एक आपराधिक अथवा दीवानी मुकदमा दायर हो जाता है। इसमें साधारण मारपीट से लेकर हत्याएं तक होती हैं, पंजीकरण की कार्यवाहियों से बंटवारे की कार्यवाहियां होती हैं और यही आगे चलता रहता है। यदि यह विधेयक पारित हो जाता है, तो वकील आभारी होंगे, क्योंकि इससे उनके धंधे की पर्याप्त वृद्धि होगी। न्यायिक प्रक्रिया शुरू होती है और पांच अथवा दस वर्ष अथवा बीस वर्षों