660 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
तक समाप्त नहीं होती। परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी मुकदमों पर मुकदमे चलते रहते हैं और पूरा गांव गुटबन्दी में बंट जाता है। यदि एक परिवार में कई भाई हों, तो वे एक साथ रह सकते हैं, एक साथ सम्पत्ति का प्रबंधन कर सकते हैं, यद्यपि उनकी पत्नियां आपस में झगड़े करती रहती हैं। इसी तरीके से हिन्दू संयुक्त परिवार व्यवस्था काम करती है। यानी एक मुस्लिम परिवार और एक हिन्दू परिवार में सिवाय इसके कोई अन्तर्निहित अन्तर नहीं है कि मुस्लिम बँटवारे और पृथक रहने के आदी रहे हैं, और हिन्दू संयुक्त और सामूहिक जीवन जीने के आदी हैं। संभवतः बहुत थोड़े से मेरे प्रिय हिन्दू मित्र वास्तविक कठिनाई को देख सकते हैं, जो पुत्री को हिस्सा देने से उत्पन्न होगी। वस्तुतः इससे पुत्री को कभी लाभ नहीं होगा। लाभ को संतुलित करने के प्रयास से तुलनात्मक हानि होती है। मान लो एक मुकदमे और एक हिस्से से एक पुत्री एक हद तक लाभान्वित हो जाती है। वह अपने पति के घर जाती है, उसके अपने पुत्र और पुत्रियां होते हैं। वह सब कुछ जो वह अपने भाई से लेकर गई थी, वह उसकी पुत्री उसके पुत्रों से ले लेगी। महिलाओं के व्यक्तिगत और अलग जीवन पर विचार करने की बजाय, यदि हम उसे पारिवारिक जीवन का एक हिस्सा मानें, तो ऐसी स्थिति में लाभ और हानि का असंतुलन नहीं होगा। मैं कहता हूँ कि पुत्री का हिस्सा अंतहीन जटिलताओं और मुकदमेबाजी, झगड़ों और गलतफहमियों की शुरूआत करेगा और कुछ नहीं। वास्तव में, यह मेरा कटु अनुभव है कि कोई भी मुस्लिम परिवार तीन पीढि़यों तक समृद्ध नहीं रहा है। इन और अन्य बातों ने उन्हें कंगाल ही बनाया है। मुद्दा यह नहीं है कि व्यवस्था अच्छी है अथवा खराब।
जहाँ तक हिन्दुओं का प्रश्न है, उन्होंने अपनी व्यवस्था को स्वीकार कर लिया है और जब तक बहुमत इस बात से आश्वस्त न हो जाए कि वह जिस व्यवस्था में जी रहे हैं और जो इतनी सशक्त हैं, एक ऐसी व्यवस्था जो अनेक विदेशी आक्रमणों के विध्वंसों के बाद भी टिकी हुई है, जब तक वे इस बात से आश्वस्त न हो जाएं कि व्यवस्था खराब है, इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। मेरा तर्क यह है कि हिंदू बहन और मुस्लिम बहन के बीच अंतर करना बहुत खतरनाक होगा, क्योंकि उनकी स्थिति समतुल्य नहीं है और वास्तव में उनमें अन्तर करने वाले जो तत्व मौजूद हैं, वे विभिन्न इतिहासों, विचारों और माहौल से उत्पन्न हुए हैं। इसलिए, हिंदू बहन और मुस्लिम बहन की स्थिति के बीच कोई साधारण समानता नहीं है। मैं सोचता हूँ कि सभी विचारणीय पहलुओं में एक पुत्री के हिस्से को लेकिन निष्पक्ष विचार होना चाहिए। स्वयं पुत्री के लिए भी यह कोई शुद्ध लाभ वाली बात नहीं है। यह विखण्डन को बढ़ावा देता है। मैंने इसका विस्तार से उल्लेख नहीं किया होगा, किन्तु इस तथ्य के लिए कि 9 अप्रैल को जब विधेयक प्रवर समिति को भेजा गया था, मैंने इस अनिष्टकारी प्रवृत्ति का उल्लेख किया था और श्रीमती हंसा मेहरा ने आश्चर्य व्यक्त किया था कि पुत्री को हिस्सा देने से मुकदमेबाजी अथवा संपत्ति के बंट जाने का बढ़ावा मिलेगा। इस तथ्य के कारण कि शायद हमने जिस अनिष्ट का अनुभव किया है,