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भाग्यवश हिन्दू समाज में अनुभव नहीं किया गया है। यही कारण है कि गलतफहमी की संभावना थी, और इसलिए मैंने इस मामले का उल्लेख किया है। श्रीमान्, मैं कहता हूँ कि हिन्दू विचारधारा और हिंदू परिवारों के संदर्भ में पुत्री की स्थिति पर विचार किया जाना चाहिए। हर कोई पुत्री को स्नेह करता है। इसका अच्छे से विवाह करता है, और विवाह के समय अनेक तोहफे दिए जाते हैं, वही दहेज होता है और इसके अलावा कभी-कभी बड़ी सम्पत्तियां भी दी जाती हैं। और अपने पिता के घर में पुत्री मेहमान बन जाती है। परन्तु यदि आप उसे सम्पत्ति का एक हिस्से दे देते हैं तो भाई-बहन में आगे चलकर प्रेम का रिश्ता न रहकर वह रिश्ता व्यापार में बदल जाएगा, जिससे आपसी हित टकराते हैं। वास्तव में यदि पुत्रियों को हिस्सा देते हुए हिंदू समाज की जड़ों को बेचने की अनुमति दी जाती है तो इससे प्रेम समाप्त हो जाएगा। श्रीमान्, यह कुछ ऐसे विचार हैं जिनके बारे में मुझे विश्वास है कि उन पर निष्पक्ष रूप से विचार किया जाना चाहिए।
श्री महावीर त्यागीः आपका अनुभव कैसा है?
अध्यक्ष महोदयः ऑर्डर, ऑर्डर।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः मेरा अनुभव यह है कि हम कंगाल हो चुके हैं। यदि हिंदू समाज यह सोचता है कि कंगाल होना एक कलाप्रेम है, तो इस व्यवस्था को स्वीकार करने के लिए उनका स्वागत है। कुल मिलाकर हम सम्पूर्ण-समानता वाले वर्गविहीन समाज की शुरूआत की बातें सुनते हैं। वस्तुतः यह समानता गरीबी और दरिद्रता की होगी। किन्तु मैं अपनी व्यवस्था की शिकायत नहीं कर रहा। और कुल मिलाकर, यह स्थान इस पर चर्चा करने का है भी नहीं। मैं यहां केवल यह कहना चाहता हूँ कि पूरे विषय पर हिंदू समाज को सोच-समझकर विचार करना चाहिए, इसे मात्र भाई और बहन की समानता के परिप्रेक्ष्य में नहीं देखना चाहिए। यह मात्र एक नारे से बढ़कर है। यहां मैंने कुछ पहलुओं की ओर थोड़ा सा इशारा किया है। कई अन्य मुद्दे भी हैं किन्तु मेरे लिए सभी पहलुओं पर टिप्पणी करना कठिन है। यह हो सकता है कि मैंने कुछ छोटे-छोटे पहलुओं पर अधिक जोर दिया हो और अन्य कुछ पर ध्यान न दिया हो। परन्तु ये कुछेक ऐसी टीका-टिप्पणीयां है जो, जहाँ तक पुत्रियों का संबंध है, लोगों को सोचने, न कि उन पर काम करने, के लिए मजबूर कर सकती हैं।
और अब प्रश्न उठता है समानता का। कुछ मामलों में क्या महिलाएं भी कभी-कभार पुरुषों से श्रेष्ठ नहीं होती हैं? मेरा मानना है कि कई क्षेत्रों में वे श्रेष्ठ होती हैं। वह घर की मालकिन होती हैं। वह अपने पति की आत्मा, उसकी जेब, उसकी सम्पत्ति, उसकी अभिरूचियों, उसकी सनक आदि की मालकिन होती है, हर चीज उसके द्वारा नियंत्रित की जाती है। अतः मैं कहता हूँ कि महिला को सिर्फ इसलिए स्वयं को अनदेखा किया जाना महसूस नहीं करना चाहिए, कि उसे कोई हिस्सा नहीं दिया जा रहा है। वास्तव में,