हिन्दू संहिता - जारी... - Page 678

663

श्रीमान्, इसके बाद उत्तराधिकार का एक सामान्य पहलू भी है। वस्तुतः, यह एक ऐसा मामला है जिस पर सावधानीपूर्वक विचार किया जाना चाहिए।

अब, मैं विधेयक के अगले भाग पर आता हूँ, जिसका नाम है, विवाह। वस्तुतः यह एक विवाह में प्रथा के बारे में है। मैं कहता हूँ कि एक विवाह-प्रथा सैद्धांतिक तौर पर अच्छी है और व्यवहार में भी अच्छी है। और मेरा भी विश्वास है कि ज्यादातर व्यक्तियों के दो पत्नियां नहीं होती हैं। एक ही पत्नी काफी मूल्यवान और सताने के लिए भी काफी है। वास्तव में, दो पत्नियां होना एक दुलर्भता ही है। यह एक विरलता है क्योंकि आम तौर पर मैंने किसी के दो पत्नियां नहीं देखी हैं। ऐसा बहुत कम होता है। यह बात बहुत विशेष मामलों तक ही समिति है, क्योंकि राजनैथ्त और आर्थिक परिस्थितियों की अत्यावश्यकता किसी के लिए भी दो पत्नियों से विवाह करना असंभव बनाती हैं। किन्तु मुद्दा यह है कि क्या हमें कानून के द्वारा अथवा आम जनता के राय से एक विवाह-प्रथा को लागू करने का प्रयास करना चाहिए। कुछ व्यक्तियों की स्थिति ऐसी हो सकती है, कि मौज-मस्ती के लिए दो पत्नियों से विवाह नहीं करते, बल्कि पुत्र की चाह में ऐसे विवाह करते हैं। हिन्दू मान्यता के अनुसार, एक पिता को मरणोपरांत नर्क, जिसे ‘पूथ’ भी कहा जाता है, से बचाने के लिए पुत्र की आवश्यकता होती है। एक व्यक्ति जो आपको पूथ से बचाता है, उसे ‘पुत्र’ यानि बेटा कहते हैं। अन्यथा व्यक्ति निश्चित रूप से नर्क यानि पूथ में जाता है। हिन्दुओं के अनुसार एक पुत्र का होना एक धार्मिक आवश्यकता है और पुत्र होने का अर्थ है कि, यदि पत्नी बांझ है, तो पति दूसरे विवाह का प्रयास करता है। मेरे अनुभव के अनुसार ऐसा हुआ है, और कई अन्य लोगों के अनुभव में भी ऐसा हुआ होगा कि पति का दूसरा विवाह इसलिए हुआ, क्योंकि पहली पत्नी बांझ है और मैंने कई खुशहाल परिवार भी देखे हैं, जहाँ पहली पत्नी, जिसके कोई बच्चा नहीं था, ने वास्तव में अपने पित को दूसरे विवाह के लिए उकसाया अथवा प्रेरित किया है, और पहली पत्नी बहुत खुशी-खुशी पूरे परिवार के साथ रही है। पुत्र के मामले में इसी तरह की इच्छा या विश्वास बंगाल के भारतीय मुसलमान में भी व्याप्त है।

श्री तजामुल हुसैनः मैं अपनी और अन्य माननीय सदस्यों की जानकारी के लिए एक प्रश्न करना चाहता हूँ। मैं समझता हूँ कि एक हिंदू पिता को अपनी मुक्ति के लिए एक पुत्र की आवश्यकता होती है तो क्या अपनी मुक्ति के लिए एक हिंदू माँ को भी एक पुत्र की आवश्यकता होती है? और यदि माँ को आवश्यकता होती है, तो उसे बहुपतित्व का अधिकार मिलना चाहिए।

माननीय अध्यक्षः हमें सदन के बाहर भी काफी अच्छी जानकारी मिल सकती है। इसलिए सदन के भीतर, इस समय, हम हिंदू संहिता की बात जारी रखें।