हिन्दू संहिता - जारी... - Page 679

664 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

श्री नजीरुद्दीन अहमदः अतः मेरा कहना है कि बहु विवाह-प्रथा अमूर्त तर्क और अमूर्त विधान के दृष्टिकोण से इतनी खतरनाक नहीं है, जितनी समझी जाती है। एक विशेष संदर्भ में इस पर विचार किया जा सकता है। यदि एक हिन्दू पति की यह इच्छा है कि उसे एक पुत्र की प्राप्ति हो और इस उद्देश्य से वह पुनः विवाह करना चाहता है, पर यदि वह अपनी पहली पत्नी के रहते ऐसा नहीं कर सकता, तो इससे तलाक की कार्रवाइयों को बढ़ावा मिलेगा। एक विवाह के प्रावधान में, पहली पत्नी के जीवनकाल में अथवा पहली पत्नी के साथ वैवाहिक संबंध बने रहने की स्थिति में दूसरे विवाह पर रोक के कारण तलाक को बढ़ावा मिलेगा। हमें इसे केवल मौज-मस्ती नहीं समझना चाहिए। वास्तव में ऐसा हमारे इतिहास में और अनेक यूरोपीय देशों में भी घटित हुआ है। नेपोलियन बोनापार्ट ने जोसफिन नामक महिला से विवाह किया, जो उनकी प्रिय पत्नी थी। उसके कोई बच्चा नहीं हुआ और नेपोलियन अपने विशाल साम्राज्य के सिंहासन पर आसीन करने के लिए एक उत्तराधिकारी चाहता था। वह साम्राज्य उसने अपने कौशल से खड़ा किया था अतः उसके लिए उसने क्या किया? उसने अपनी पहली पत्नी को तलाक दे दिया, यद्यपि वह उससे असीम प्रेम करता था, किन्तु एक पुत्र की चाह और अपने परिवार को स्थायी और अपने से बेहतर बनाने की इच्छा के चलते, उसने एक राजकुमारी से विवाह किया और उसने सोचा कि आस्ट्रिया की राजकुमारी के साथ शाही गठबंधन से वह सदा के लिए अपनी शक्ति को बढ़ा सकेगा और वह दोनों के साथ

खुश भी रहेगा। यह एक ऐतिहासिक उदाहरण ही है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडरकरः नेपोलियन का बाद में क्या हुआ?

श्री नजीरुद्दीन अहमदः उसकी सेंट हेलेना में दुखदायी मृत्यु हो गई।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः यदि उसे साम्राज्य की स्थापना की इच्छा न हुई होती, तो शायद वह ज्यादा जिन्दा रहता।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः श्रीमान्, यह इतिहास से एक उदहारण था। यदि एक पुत्र की चाह में एक हिंदू को विवाह से रोका जाता है और यदि वह मानता है कि पुत्र उसके लिए आवश्यक है, और यदि उसे विश्वास है कि उसकी पत्नी उसके पुत्र को जन्म नहीं दे सकती है, तो वह कुछ बहाना करने की सोचेगा। कई मामलों में तब वह बेमेल विवाह कर लेता है। क्या आप किसी व्यक्ति को बेमेल विवाह करने से रोक सकते हैं, अथवा उसे इस पूरे धार्मिक विश्वास के साथ एक तकनीकी अपराध करने से रोक सकते हैं कि वह जो कुछ कर रहा है केवल और पूरी तरह से अपने विवेक के अनुसार कर रहा है? यह एक ऐसे व्यक्ति की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने जैसा होगा, जो पूरी तरह से धार्मिक विचारों और धार्मिक आस्थाओं से बंधा हुआ है। इसलिए ऐसे विशेष मामलों में इन मुद्दों पर विधायिका द्वारा नहीं, बल्कि जनता की राय से कार्रवाई की जानी चाहिए।