हिन्दू संहिता - जारी... - Page 680

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बहु-विवाह प्रथा अन्दर ही अन्दर क्षीण हो रही है और बहाने आदि बनाकर इस प्रक्रिया में नकली हड़बड़ी नहीं करनी चाहिए। बहु-विवाह प्रथा पर पूर्णतया प्रतिबंध लगाना एक दोष है और विधेयक के रास्ते में आने वाली एक व्यावहारिक कठिनाई भी। यदि एक व्यक्ति को एक दूसरी पत्नी की जरूरत है, तो उसे पाकिस्तान जाने से कौन रोक सकता है? (श्री महावीर त्यागीः आपका दूसरे पति के बारे में क्या ख्याल है?)। कुछ जगहों पर दूसरे पति का होना भी प्रचलन में है। श्री त्यागी को इस बात की जानकारी भी होगी। बहु-विवाह प्रथा भारत में प्रतिबंधित हो जाएगी और आप इसकी जानकारी होने से मना करेंगे। परन्तु जिस व्यक्ति को एक पुत्र अवश्य चाहिए, उसे एक अन्य विवाहित पत्नी अपने घर लाने से दूसरी पत्नी जो पाकिस्तान जाकर ब्याही है-कौन-सी बात रोकती है? और यह भी हो सकता है कि पत्नी भी इसके लिए सहमत रही हो। तब क्या आप एक ऐसा कानून पिरत कर देंगे जो हिंदुओं की गहरे पैठ चुकी भावनाओं और विश्वास के विरुद्ध हो। ऐसे गंभीर मामलों पर विचार किया जाना है। एक सशक्त विधायिका के लिए यह कोई महत्वपूर्ण विषय नहीं है कि वह हिन्दुओं के प्रचलित सिद्धांतों और मौलिक विचारों के विरुद्ध जाए। इस प्रकार के सशक्त कानून को लागू करने से पहले हमें इस मामले पर सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए और उसके बाद ही दूसरे विवाह के मामले में दण्ड, कानूनी सजा का प्रावधान किया जाना चाहिए। मेरा कहना है कि हमें ऐसा कानून पारित नहीं करना चाहिए, जो हमारी जनता के लिए लोकप्रिय न हो, जो निरपवाद रूप से उसका उल्लंघन करने और बहाने बनाने को बढ़ावा देता हो। हमें शारदा अधिनियम का परिणाम ज्ञात है। शारदा अधिनियम का पहला प्रभाव यह पड़ा कि कानून लागू होने से पहले ही लाखों बाल-विवाह संपन्न हो चुके थे। इसका पहला प्रभाव यह भी हुआ कि बहुत-सा ऐसा अनिष्ट हुआ, जिसे रोकना इस कानून का उद्देश्य था। उसके बाद आज भी क्या स्थिति है? मान लीजिए किसी व्यक्ति की एक विवाह योग्य पुत्री है, जिसकी आयु शारदा अधिनियम द्वारा निर्धारित मानक आयु के अनुरूप नहीं है, और मान लीजिए एक उपयुक्त दूल्हा (वर) उपलब्ध है, तो क्या आप उस पिता अथवा अभिभावक को नैतिक तौर पर दोषी ठहरा सकते हैं, जो अपनी अवयस्क पुत्री का विवाह करता है? क्या ऐसा करना मात्र इसलिए असुरक्षित होगा कि वह व्यक्ति किसी सैद्धांतिक कानूनी अथवा राजनीतिक समझ का उल्लंघन करता है? कानून द्वारा प्रचलित रीतियों को एकदम असंभव नहीं बनाया जाना चाहिए। प्राचीन रीतियां लोगों की आस्थाओं और अभिरुचियों से जुड़ी होती हैं। शारदा अधिनियम व्यापक रूप से इसीलिए विफल हुआ है और जनता की राय इस बारे में इतनी सशक्त है कि आज शारदा अधिनियम के तथाकथित उल्लंघन के विरुद्ध कोई मुकदमा शायद ही दायर हुआ हो। वास्तव में उस कानून को एक संशोधन द्वारा लागू किया गया था और उसके विरुद्ध एक शिकायतकर्ता के समक्ष कई कठिनाइयां हैं। उसमें पहली समस्या तो यह है कि वह उस लागत राशि को जमा कराए जो उसके मुकदमा हारने की स्थिति में जब्त कर ली