हिंदू विवाह वैधता विधेयक - Page 69

54 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

भाषण को समझ नहीं सकी। आज प्रातः उन्होंने सदन की क्षमता का प्रश्न उठाया और दोपहर के बाद, बैठने से पूर्व उन्होंने कहा कि वहख्...,

पंडित ठाकुर दास भार्गवः मैंने इस सदन की क्षमता का प्रश्न कभी नहीं उठाया।

श्रीमती रेणुका रेः इसलिए, मेरा अनुमान है कि उन्होंने अन्त में कहा था कि क्या हो रहा है। उन्होंने ग्यारह असहमति की टिप्पणियों के बारे में बहुत कुछ कहा था। परन्तु जैसा कि वह जानते हैं और सदन को पता है कि असहमति की टिप्पणियों में से अधिकांश टिप्पणियां छोटे-छोटे मामलों से संबंधित हैं और इस प्रकार की टिप्पणियां सभी विधेयकों के साथ संलग्न की जाती हैं, पर इसका अर्थ यह नहीं है कि विधेयक का पुनः वितरण किया जाए। प्रातःकालीन सभा में पंडित भार्गव ने कहा था कि दो भूलें मिलकर सही नहीं बन जातीं और तब उन्होंने कहा था कि यह संवैधानिक विधानसभा स्पष्ट रूप से भारत का संविधान बनाने के लिए उपयुक्त नहीं है। मुझे आश्चर्य है सदन में वे कैसे ठहर सकते हैं। दो गलतियां एक सही नहीं बनाते हैं। मैं उनकी बात का

खंडन नहीं करना चाहती या जो कुछ भी उन्होंने दोपहर के बाद कहा है उसे पुनः कहना चाहती हूँ, क्योंकि मेरा विचार है कि माननीय विधि मंत्री ने योग्यतापूर्वक कह दिया है और पंडित भार्गव ने उनमें से कुछ बातों का स्वयं ही खंडन कर दिया था।

एक अन्तिम बात यह है कि जिसे मैं कहना चाहूँगी। इस बात की चीख-पुकार हुई है कि हिंदू समाज, सुधार के इस हल्के और लंगड़े उपायों के कारण खतरे में है। मेरा भी विचार है कि हिंदू समाज खतरे में है। यह भारी खतरे में है, खतरा उन लोगों से, जो उसे बन्दी बना देते हैं और पैरों में बेडि़यां डाल देते हैं। उन लोगों से, जो घिसे हुए रिवाजों को बदलने नहीं देते वरन् उन्हें अनुमति देते हैं हमारे समाज जीवन-रक्त को श्वासावरोधी बनाने। यदि वे जो आज हिंदू समाज के बारे में इतने चिन्तित लगते हैं, थोड़ा विचार करेंगे, वे उस बात से सहमत होंगे जो माननीय विधि मंत्री ने कही है। अर्थात् अपने समाज को सुधारो, यदि आप उसे जीवित रखना चाहते हैं। हिंदू समाज के साथ खड़ा होने का। मैं उन पर ध्यान नहीं देना चाहती। मेरे विचार से ऐसे लोग वे हैं, जो उसे बांध लेंगे या हथकड़ी लगा देंगे। वे लोग मित्र नहीं हैं, वे हिंदू समाज के शत्रु हैं। हिंदू समाज को अब सभी कुछ पुनः प्राप्त करना है जो वह अनेक वर्षों में खो बैठा है और बर्बादी की कई शताब्दियों तक हिंदू दास रहे हैं। अतः अब वे स्वतन्त्रता के उस वातावरण में आना चाहते हैं जो आज हमारे देश में व्याप्त है। पुरुष और महिलाएं अब समान रूप से आगे आना चाहती हैं, ताकि वे देश के लिए काम कर सकें। और उनमें समानता नहीं हो सकती, यदि देश के सामाजिक कानूनों में समानता नहीं है। इसलिए मैं यह दलील देती हूँ कि आज जो इस संहिता का विरोध कर रहे हैं, उन्हें इस संहिता

ऽसीए. (विधि) डी. खंड 2, भाग II, 25 फरवरी, 1949, पृष्ठ 929-34