666 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जाएगी, इसलिए उसके सामने अतिरिक्त कठिनाइयां खड़ी हो जाएंगी। अतः हुआ क्या है? बाल विवाह का समर्थन नहीं करता, किंतु आपराधिक मुकदमों अथवा जोर-जबर्दस्ती से इस प्रथा को तब तक रोका नहीं जा सकता, जब तक कि लोकप्रिय भावनाओं के द्वारा इसको समर्थन और सहारा दिया जाता रहेगा। उच्च शिक्षित वर्ग में बाल-विवाह का व्यावहारिक तौर पर प्रश्न ही नहीं उठता, किन्तु निर्धन वर्ग को देखिए। यदि निर्धन वर्ग की कोई कन्या, जो अभी विवाह योग्य आयु की नहीं हुई है, एक पति की देखभाल और संरक्षण के बिना अविवाहित रखी जाती हैं, तो ऐसी अनुमति देना सुरक्षित नहीं होगा और यदि ऐसी लड़की को पति के संरक्षण के बिना रहने दिया जाए तो अनेक बुराइयां और कठिनाइयां भी खड़ी हो जाएंगी। इसका परिणाम यह होगा कि यदि उसे अपनी कानूनी आयु की होने तक रोका जाता है, तो उसके लिए पति आसानी से नहीं मिल सकेगा और इस कारण अनेक तरह की अन्य कठिनाइयां खड़ी हो जाएंगी। मेरा कहना है, श्रीमान्, कि शारदा अधिनियम की इस असफलता को ध्यान में रखते हुए ही, हमें सभी परिस्थितियों में पूरी सख्ती के साथ और ज्यादा उम्मीदों के बिना अनिवार्य एक विवाह-प्रथा के बारे में भी विचार करना चाहिए। मैं सोचता हूँ कि यह मामला गंभीर व्यावहारिक विचार-विमर्श का है, यह सिद्धांतों और नारों का मामला नहीं है। अब मैं तलाक के प्रश्न पर भी आता हूँ। तलाक किसी परिवार के समस्त दुखों के लिए रामबाण नहीं है। शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसकी अपनी पत्नी के साथ कोई गलतफहमी न हुई हो और शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा, जो इस कारण से दुखी न हुआ हो। यदि पति और पत्नी के बीच सदैव अच्छे संबंध रहेंगे तो जीवन असहनीय जो जाएगा। तब खुशियां भी, खुशियां नहीं होगी। जब तक खुशियों में दुखों और झगड़े के क्षण न हों, खुशियां पूर्ण नहीं हो सकती। वास्तव में इसी तरह की गलतफहमियां-पुनर्मिलन के लिए भी अपनाई जाती हैं। हमारे समाज में विरह और मिलन दोनों मिलकर खुशियों का कारण बनते हैं। अतः कभी-कभी गलतफहमियां भी आवश्यक होती हैं। मैं सभी अनुभवी व्यक्तियों को अपनी बातें सुना रहा हूँ। अपने जीवन में एक विक्षिप्त व्यक्ति ही हमेशा खुश रह सकता है। यदि व्यक्ति बुद्धिमान है और उसका आकर्षक व्यक्तित्व भी है, तो उसके मतभेद भी होंगे, किन्तु आगे चलकर, पत्नी को भी सफलता मिल जाएगी। अतः यदि आप कुछ समय के लिए एक दम्पत्ति को एक साथ रहने के लिए अकेला छोड़ दें, तो उनकी गलतफहमियां शरद् ऋतु के बादलों की तरह छंट जाएंगी। अतः मैं कहना चाहती हूँ कि हमें तलाक देने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।
अब मुस्लिम रिवाजों से तुलना की बात आती है। ‘‘यदि एक मुस्लिम व्यक्ति अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है, तो इसी प्रकार, किसी हिन्दू व्यक्ति को भी समान अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए? एक ईसाई धर्म का व्यक्ति अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है? तो एक हिन्दू व्यक्ति ऐसा क्यों नहीं कर सकता?’’ मैं यह कह सकता हूँ कि इन मामलों में तीनों धर्मों की व्यवस्थाएं पूरी तरह से एक-दूसरे से भिन्न हैं। तथापि व्यावहारिक कारणों