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से एक मुस्लिम व्यक्ति अपनी पत्नी को तलाक देने के लिए स्वतंत्र नहीं है। उसे तलाक देने के असीमित अधिकार हैं, किन्तु उसे मेहर की रकम जुटानी होती है, जो आमतौर पर उसकी पहुंच से बाहर होती है, क्योंकि यदि उसकी क्षमता 10,000 रुपये अथवा एक लाख रुपये तक पहुंच सकती है। मुस्लिम विवाह कानून में यह स्पष्ट व्यवस्था है कि मेहर की रकम एक मुस्लिम पति के तलाक देने के असीमित अधिकार पर रोक लगा देती है। अतः यह प्रत्येक मुस्लिम पति पर एक बहुत प्रभावी व्यावहारिक रोक है, यद्यपि वह अपनी पत्नी से असंतुष्ट भी हो सकता है। वास्तव में इसे एक पर्याप्त निवारक स्थिति माना जा सकता है, जिसमें अनेक दबंग पतियों को तलाक देने के प्रयास से रोका जा सकता है। इसी तरह यदि एक हिन्दू पति अपनी पत्नी से असंतुष्ट होता है, तो उसका असंतोष को दूर करने के लिए हमें थोड़ा समय देना चाहिए। यदि आप इसका रास्ता आसान बना देते हैं तो इसका परिणाम यह होगा कि ज्यादा पार्टियां अदालतों में जाएंगी और वहाँ से उन वकीलों को लाभ पहुंचाएंगी, जो सदन के एक वर्ग के लिए अभिशाप है। जिन्हें अदालतों में तलाक की कार्यवाहियों का अनुभव है, वे जानते हैं कि वहां कैसे-कैसे घिनौने विवरणों का हवाला दिया जाता है। एक सभ्य व्यक्ति को उन्हें सुनना भी नहीं चाहिए। वहां दूसरे के सामने जारकर्म सिद्ध करना होता है, अन्यथा तलाक की अनुमति नहीं दी जाती। तलाक लेने वाले परिवारों में दुख इतने ज्यादा होते हैं कि परिवार के दुखों के लिए तलाक को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यदि हिन्दू पत्नी अथवा पति को अदालत में जाने का अधिकार दे दिया जाए, तो इसका यह प्रभाव होगा कि अस्थायी गलतफहमियां, जो समय के साथ दूर हो सकती हैं, वे जीवन भर के दुखों का कारण बन जाएंगी। अतः विद्यमान समस्याओं को हल करने के प्रयास में आप केवल नई समस्याएं ही पैदा करेंगे।
(इसी समय अध्यक्ष अपनी कुर्सी से उठ गए और उपाध्यक्ष महोदय (श्री एम. अनंतसायनम आयंगर) ने इसका स्थान ग्रहण किया)
इस संदर्भ में अदालत का आश्रय उपलब्ध कराया जाता है तो, यह होगा कि महिला की अपेक्षा पुरुष इस प्रावधान का लाभ उठा लेगा। यह सुझाव देना नितांत मूर्खता होगी कि कोई दुखी महिला तलाक की कार्यवाही से राहत पा सकेगी, क्योंकि ऐसा अवश्य संभावित है कि वह स्वयं की बलि चढ़ा देगी। अधिकांश मामलों में पति गलत प्रकार से आरोप लगाते हुए न्यायालय में जाएगा क्योंकि विधेयक में उनका उल्लेखी किया गया है, और एक पक्षीय आधार पर तलाक पा लेगा। जो यह जानते हैं कि यदि एक महिला न्यायालय का शरण में जाती है, तो हमारा समाज यह कल्पना कर सकता है कि इसकी क्या संभावना है कि उस महिला के विरुद्ध लगे आरोप सिद्ध नहीं होंगे। तब उस महिला केस कौन लड़ेगा, जिसका पति उसे अलग कर देना चाहता है? यह पुरुष ही है जो अक्सर न्यायालय की शरण लेता है। और यदि पत्नी बांझ हो तथा पति को दूसरे विवाह