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अतः एक सभ्य यूरोपियन महिला स्वयं अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है और उसकी स्थिति हमारे देश की किसी प्रगतिशील, फैशनेबल महिला से नहीं, बल्कि गरीब महिला से बिल्कुल भिन्न है, जिसका कोई हमदर्द नहीं है और जिसके पति ने उसे त्यादा दिया है और उसके पिता से भी उसके संबंध समाप्त हो चुके हैं। जैसा कानून मंत्री ने मशाक में कहा, लेकिन तलाकशुदा महिला के लिए पति को पाना सरल नहीं है_ भले ही वह वैसा चाहती हो। उसके लिए एक उपयुक्त पति एकदम उपलब्ध नहीं होता, अतः उसकी स्थिति बहुत कठिन हो जाएगी और ऐसी महिला तलाक व्यवस्था की बदतरीन शिकार बनती जाएगी। तब न्यायालय के आरोप भी इतने गंभीर होंगे कि उन पर विचार करना होगा। ऐसे केसों में न्यायालय की कार्यवाही भी घृणित होगी, और हमारे समाज की आज की स्थिति में, हमारे लिए असंभव होगा कि वह पति और पत्नी के न्यायालय की शरण लेने की अनुमति दी जाए।
अब इसका एक अन्य पहलू भी है। आदिवासी और कुछ अन्य जातियों में एक तरह का पारंपरिक तलाक होता है जिसमें औपचारिकताएं बहुत साधारण होती हैं। उन्हें बहुत आसानी और शीघ्रता से तलाक मिल जाता है, किन्तु यदि उन पर न्यायालय में जाने का दबाव डाला जाएगा, तो इसका यह अभिप्राय होगा कि वे वित्तीय और अन्य कारणों से ऐसा नहीं कर पाएंगी। जिस तलाक को वे अपने रीति-रिवाज के अनुसार आसानी से पा सकती हैं, वह उनके लिए वर्जित हो जाएगा। इस तरह जब आप एकरूपता पाना चाहते हैं, तो आप मामलों को जटल बना देना चाहते हैं। सैद्धांतिक तौर पर कानून में एकरूपता हो सकती है, किन्तु गरीब लोगों के विरुद्ध यह कड़ाई से काम करेगी। आसान तलाक के नाम पर लोग न्यायालयों का रुख करेंगे, तब समय एक समाधान का प्रभाव छोड़ चुका होगा, घरेलू खुशियां छिन्न-भिन्न हो जाएंगी और संबंधित पार्टियां और समाज तब हमेशा के लिए पश्चाताप करेंगी। इन गरीब लोगों के जीवन-यापन के सरल तरीकों पर यह कृत्रिम कानून थोपना बहुत कड़ा कार्य होगा। इससे चीजें महंगी होंगी, क्योंकि प्रत्येक आदेश के लिए उच्च न्यायालय के निर्णय का सहारा लेना होगा और यह एक महंगा कार्य होगा। इन सब के बावजूद मैं कहता हूँ कि पार्टियों को स्वयं के निर्णय पर छोड़ देना चाहिए। इस कानूनी तरीके से तलाक की शुरूआत सभ्यता के विभिन्न चरणों से लोगों के सभी वर्गों के लिए लागू करना बहुत हानिकारक होगा। अपनी दलितों के समर्थन अथवा उन्हें शक्ति प्रदान करने के लिए यहां लोगों के लिए संस्कृत के श्लोकों का उद्धरण देना एक रिवाश है। अतः मैं भी एक प्रयास करूंगाः जिसका भाव हैः-
जब दो बकरे लड़ते हैं, तो वे अपने पिछले पांवों पर खड़े हो जाते हैं और सींग आपस में भिड़ाकर एक गंभीर प्रभाव छोड़ते हैं, किन्तु उनकी वास्तविक भिडन्त बहुत छोटी होती है। जब एक बहुत विशाल समारोह में लाखों ऋषि एक श्राद्ध के लिए जुटते हैं, तो केवल एक मिनट में लिए जा सकने वाले भोजन की मात्रा ही पर्याप्त होती है।