हिन्दू संहिता - जारी... - Page 685

670 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जैसे प्रातःकाल में घुमड़े बादलों में बिजली की कड़वाहट लगती तो धमकी भरी है, किन्तु अन्त में इनसे कोई भारी वर्षा नहीं होती। इसी तरह वैवाहिक झगड़े, यद्यपि गंभीरता से और धमकी भरे अंदाज से शुरू होते हैं, पर उनके अन्त में कोई गंभीरता नहीं होती।

इसलिए घरेलू झगड़ों में नैसर्गिक और सामाजिक दबावों की अनुमति ही दी जानी चाहिए ताकि मेल-मिलाप आसानी से कराया जा सके।

तलाक के बाद आपको उन्हें समय देना चाहिए। तलाक के मामलों में ताली एक हाथ से नहीं बजती। इसे हर व्यक्ति के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। माननीय कानून मंत्री ने एक बहुत नया तर्क दिया है कि 90 प्रतिशत लोग यहाँ ‘शुद्र- है और ये 90 प्रतिशत लोग तलाक की प्रक्रिया में शामिल होते हैं, इसलिए यह सही और उचित ही होगा कि बहुमत के कानून को शेष 10 प्रतिशत के लिए भी लागू किया जाए। यह कोई न्यायसंगत तर्क नहीं है। यह स्वीकार्य भी नहीं है। भारत में मुस्लिम बहुत ही कम संख्या में है। क्या इसी एक कारण से सभी मुस्लिमों को परिवर्तित करके हिंदू बना देना चाहिए अथवा उन पर हिंदू कानून थोप देने चाहिए? तब उदाहरण के लिए, हिंदू रीति के अनुसार उनके मृत शरीरों का अंतिम संस्कार किया जाना चाहिए? अन्य उदाहरण लें। पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यक हैं। क्या हिंदू उसे न्यायसंगत कहेंगे, यदि मुस्लिम कानून उन पर भी थोप दिया जाए? और वहाँ की बहुसंख्यक आबादी के रीति-रिवाजों के अनुसार हिंदू भी अपने मृत परिजनों को दफनाने लगें? अतः बहुमत वाले तर्क का यहाँ भी कोई महत्व नहीं है।

जहां तक 90 प्रतिशत लोगों द्वारा तलाक की अपनी प्रथा से संबंधित वक्तव्य का प्रश्न है, मद्रास से प्रकाशित समाचार-पत्र ‘हिंदू’ के संपादकीय में कहा गया है कि जहां तक मद्रास का संबंध है, यह एक ‘नितांत झूठ’ वक्तव्य है। यानी वह मद्रास की अनुसूचित जातियों अथावा शूद्रों पर बिल्कुल भी लागू नहीं होती।

अब मैं बंगाल के बारे में अपने अनुभवों की बात करता हूँ। बंगाल के कई विख्यात सदस्य यहां हैं, विशेषकर पंडित मैत्रेय उनमें से एक हैं। यदि मैं गलत हूँ तो वे मेरी बात का सुधार भी कर सकते हैं। क्या बंगाल के 90 प्रतिशत शूद्रों में यह रिवाज हैंख्...,?

पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रेयः यह एकदम विवेकशून्य बात है।

एक माननीय सदस्यः वह एक शूद्र नहीं है?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैत्रेय, एक शूद्र?

श्री नजीरुद्दीन अहमदः हम उन्हीं के बीच में रहते हैं। क्या अधिकांश शूद्रों में रिवाज है कि वे तलाक का सहारा लेते रहें?