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बाबू रामनारायण सिंहः कुछ मामलों में।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः सचमुच! किन्तु इससे भी यह 90 प्रतिशत शूद्रों का नियम नहीं बन जाता। पीछे असम के कुछ सदस्य खुसफुसा रहे हैं कि ऐसा है। मैं मानता हूँ कि असम में चाय की पैदावार होती है और तलाक की भी! किन्तु बंगाल तलाके के बिना चाय की पैदावार कर लेता है। श्रीमान् मैं कहता हूँ कि इस बारे में बहुमत का तर्क एक गलत अवधारणा पर आधारित है। यह वास्तविकता नहीं है। ऐसा हो सकता है कि बम्बई में यह बहुत प्रचलित हो और इसी कारणवश माननीय कानून मंत्री भारत के अन्य भागों में भी इसे लागू (करने के लिये) प्रभावित हो गए हों। अतः, यह मानना कि 90 प्रतिशत लोग तलाक को स्वीकार करते हैं तथ्यों पर आधारित नहीं है। और यदि यह सत्य भी हो, तो यह उन पर लागू नहीं किया जाना चाहिए, जो उस व्यवस्था का पालन नहीं करते। यह तर्क विफल हो गया है, अतः उसके समर्थन में उसका उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। यह व्यवस्था दो तरह की हो सकती है-सीधा तलाक अथवा एक समान तलाक। यद्यपि एक एक-समान प्रक्रिया और नियम उन सभी मामलों में कठिनाइयां पैदा करेंगे, जहां रीति-रिवाज के अनुसार तलाक का एक साधारण रूप प्रचलित है, और ऐसे परिवारों में भी दुख और बाधाएं उत्पन्न करेंगे, जहां तलाक का प्रचलन नहीं है। वर्तमान समय में जबकि कानूनी अदालतों का रुख करना सरल है, निर्धन वर्गों की तुलना में धनाढ़य वर्ग इस प्रक्रिया के तथाकथित लाभ उठाना चाहेंगे। अतः, यदि तलाक, तलाक दिया जाना हो, तो यह लोगों की सहमति से दिया जाना चाहिए। पहली पत्नी की सहमति से विशेष परिस्थितियों के अंतर्गत दूसरे विवाह की अनुमति भी दी जा सकती है। यों बहुविवाह प्रथा तेजी से समाप्त होती जा रही है पर इसे कानूनन समाप्त नहीं किया जाना चाहिए। इससे तलाक की कार्यवाहियों को बढ़ावा मिलेगा, अथवा व्यक्ति यहां से पाकिस्तान अथवा वर्मा अथवा मलाया या अन्य देशों में जाकर दूसरा विवाह करके वापस आ जाएगा। इसलिए यदि समाज पर्याप्त प्रगति नहीं करता है और एक-विवाह प्रथा तथा तलाक की आवश्यकता को लेकर शिक्षित नहीं होता या पर्याप्त जागृत नहीं होता, तो उनके द्वारा इस तरह का प्रावधान स्वीकार नहीं किया जाएगा और कई मामलों में टालमटोल को बढ़ावा मिलेगा। अतः अदालती कार्यवाही को प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए। पुनः यदि तलाक की कार्यवाहियां अक्सर होती रहेंगी तो उनसे पर्याप्त मात्रा में दुखों को भी बढ़ावा मिलेगा।
श्री खुर्शीद लाल (संचार उप मंत्री) क्या मैं जान सकता हूँ कि यदि तलाक इतना बुरा है, तो क्या माननीय सदस्य मुस्लिम कानून में से तलाक को खत्म करने का समर्थन करेंगे?
श्री नजीरुद्दीन अहमदः माननीय सदस्य यद्यपि प्रवर समिति के सदस्य हैं, वह इस मामले पर सदन में हुई पिछली चर्चा के दौरान उपस्थित नहीं थे। मैं सोचता हूँ कि