हिन्दू संहिता - जारी... - Page 687

672 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

माननीय सदस्य पोस्टकार्डों की दरों में की गई बढ़ोतरी पर अपनी गंभीर चिंता व्यक्त करें न कि इस चर्चा के बीच में एक असंबद्ध तरीके से बाधा डालें। माननीय सदस्य की अनुपस्थिति में इस मामले पर पहले ही बहुत व्यापक चर्चा की जा चुकी है।

श्री खुर्शीद लालः क्या यहाँ ‘पोस्टकार्ड’ का कोई संबंध है?

माननीय उपाध्यक्षः बेहतर यह होगा कि हम यहाँ ‘पोस्टकार्डों’ से तलाक ले लें!

श्रीरामनाथ गोयनका (मद्रासः सामान्य)ः मैं समझता हूँ कि आपको शरियत कानून में परिवर्तन करने का प्रस्ताव लाना चाहिए।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः शरियत कानून को समाप्त करना वर्तमान कानून में हस्तक्षेप करना होगा। हिन्दुओं में एक विवाह-प्रथा और तलाक की शुरूआत करना वर्तमान कानून में हस्तक्षेप करना ही होगा। इन दोनों के बीच यही अन्तर है। वास्तव में आपको स्वीकार्य कानून में आसानी से हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और इस प्रकार मुस्लिम कानून की सादृश्यता भी यहाँ लागू नहीं की जानी चाहिए।

श्री एच.वी. कॉमथः क्या वह प्रत्येक बात स्वीकार करते हैं जो विद्यमान है, अथवा क्या वह किसी बात में पूरी तरह परिवर्तन चाहते हैं?

माननीय उपाध्यक्षः सदन प्रस्तुत विधेयक के अलावा अभी किन्हीं अन्य परिवर्तनों के लिए चिंतित नहीं है।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः परिवर्तन का प्रश्न एक अकादमिक प्रश्न है। पर कानून में परिवर्तन का प्रश्न इतिहास की तरह प्राचीन है। वास्तव में संस्कार ही होते हैं जो केवल इसलिए परिवर्तनों का प्रयास करते हैं क्यों वे चाहते हैं परिवर्तन हों। वे केवल इस आधार पर परिवर्तन करते हैं कि यह एक परिवर्तन है। कुछ अन्य ऐसे भी हैं जो किसी परिवर्तन के लिए कभी तैयार नहीं होते, क्योंकि परिवर्तन एक नवीनीकरण होता है। इसकी चर्चा एक क्लासिकल पैसेज में मैकाले द्वारा की गई थी। और उन्होंने कहा था कि सर्वोत्तम बुद्धि सीमा रेखा के नजदीक दोनों सीमाओं के बीच रहती है। इसलिए कानून में परिवर्तन मात्र अपने भले के लिए स्वीकार नहीं करना चाहिए। पुनः, समस्त विचार-विमर्श के बावजूद, पुराने कानून का कढ़ाई से अनुपालन करना भी उसी प्रकार गलत होगा। स्थिति यह है कि आपको समय के साथ अवश्य चलना चाहिए और इससे भी बेहतर विचार यह होगा कि आप लोगों को अपने साथ लेकर चलें। मैं यहाँ नैतिक अधिकार का उल्लेख कर रहा हूँ। कानूनी अधिकार हमें प्राप्त हैं। हमारे पास इतने अधिकार हैं कि हम जो चाहें वह कानून तोड़ सकते हैं और जो चाहें कानून बना सकते हैं। इसी को कानूनी अधिकार समझा जाता है। मैं इस पर प्रश्न नहीं करता। किन्तु आपके पास ऐसा कौन-सा नैतिक अधिकार है कि आप यह परिवर्तन करना चाहते हैंख्...,