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पर कुछ अधिक विचार करना चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं करते तो यह भी हो सकता है कि हिंदू समाज और हिंदू कानून बहुत पीछे रह जाये। इसलिए हमें आगे बढ़ते रहना चाहिए, क्योंकि भारत को दासता की ओर या अन्य व्यक्तियों द्वारा आधिपत्य बनाये रखने के लिए पीछे नहीं लौटना है।
ऽश्री वी.एस. सरवते (मध्य भारत)ः मैं डॉ. अम्बेडकर को विधेयक के बारे में उनके विविधतापूर्ण तथा सहज वक्तव्य के संबंध में बधाई देता हूँ, जो उनके प्रोफेसर और अधिवक्ता व्यक्तित्व के लिए भी है।
इस विधेयक के कई उपबंधों के संबंध में कोई भी व्यक्ति निश्चित रूप से कुछ व्यक्तियों के साथ सहमति और अन्य के साथ असहमति रखेगा। यह ऐसा अवसर नहीं है कि सहमति अथवा असहमति के मुद्दों पर यहाँ ज्यादा जोर दिया जाए। मैं सामान्य रूप से उस बहस में भाग लूंगा और अपने को कतिपय व्यापक सिद्धांतों तक सीमित रखूँगा तथा मैं यह दिखाने का प्रयत्न करूँगा कि सिद्धांततः यह विधेयक उन विचारों की विरोधी दशा में जाता है, जो मेरे मत के अनुसार हिंदू कानून की पृष्ठभूमि में हैं।
हिन्द समाज का एक व्यापक वर्ग इस कानून के विरोध में हैं इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता, इसे छिपाया भी नहीं जा सकता। कुछ लोग कह सकते हैं यह धर्मसंकट का समय है। यह संवेदनशील बात है, यह तर्कहीन बात है। सब कुछ होते हुए भी, जो लोग ऐसा कानून बनाने के लिए तुले हुए हैं, जिसका सशक्त प्रभाव 20 करोड़ लोगों से अधिक के समाज पर होगा, उन्हें इसके सारांश पर गंभीरता से विचार करने के लिए रुकना पड़ेगा। उन्हें यह विचार करना चाहिए कि इस विधेयक में ऐसा है, जो इतने अधिक बुद्धिमान और शिक्षित लोगों को इस विधेयक के विरुद्ध खड़ा कर रहा है।
¹इसी समय माननीय उपाध्यक्ष ने आसन खाली किया, जिसे एस.वी. कृष्णामूर्ति राव (अध्यक्ष के पैनल के एक सदस्य) ने ग्रहण कर लिया।ह्
मैं यह निवेदन करता हूँ इसके दो कारण हैं। पहली बात, जिसका मैं उल्लेख करुंगा, का संबंध संयुक्त सम्पत्ति की प्रकृति के परिवर्तन से है। मैं यह निवेदन करूँगा कि संयुक्त सम्पत्ति के सह-समांशी पक्ष के पीछे काफी अच्छे विचार हैं। सह-समांशी का अर्थ यह है कि उसमें सामुदायिक हित है, क्योंकि घर का प्रत्येक सदस्य इसे जानता है। इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को इससे लाभ पाने का पूरा अधिकार है, परंतु उसका सम्पत्ति में व्यक्तिगत हिस्सा नहीं है और न ही उसे बेचने का अधिकार है। मेरी समझ से आधुनिक समाज की समग्र प्रवृत्ति, समाज के विचारों की प्रगति, इसी दिशा में है। हम साम्यवादियों की भर्त्सना कर सकते हैं, परन्तु विशुद्ध रूप में उन्होंने भी कुछ विचारों में संशोधन किया है और वे विचार आने हैं अतः वे विचार आयेंगे। इस बारे में साम्यवाद का क्या अर्थ है, जैसाकि मैं समझता हूँ, इसका अर्थ हैµ‘प्रत्येक व्यक्ति