हिन्दू संहिता - जारी... - Page 690

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दोपहर के भोजन के बाद 2.30 बजे सदन पुनः एकत्र हुआ। अध्यक्ष महोदय (माननीय श्री जी.वी. मावंलकर) अपने स्थान पर आसीन हुए।

श्री एच.वी. कॉमथः श्रीमान्, ऐसा प्रतीत होता है कि सदन में कोरम नहीं है।

माननीय अध्यक्षः मैं समझता हूँ कि कोरम पूरा है।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः श्रीमान्, दोपहर के भोजन से पूर्व जब हम यहाँ से गए थे, तो मैं इस प्रश्न पर बात कर रहा था कि क्या सदन के लिए इस कानून को पारित करना उचित होगा। इस सदन की संवैधानिक शक्ति के बारे में मुझे संदेह नहीं है कि हम इस प्रकृति के कानून को पारित करने के लिए संवैधानिक रूप से सक्षम हैं। प्रश्न वास्तव में यह है कि क्या हमें नैतिक अधिकार है, अथवा क्या इस कानून को पारित करना हमारे लिए नैतिक तौर पर उचित होगा। संपूर्ण रूप से प्रश्न यह होगा कि क्या हमारे निर्वाचन-क्षेत्रों द्वारा सदन को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से इस कानून से सहमत होने का प्राधिकार दिया गया है। कुछ माननीय सदस्य कहते हैं कि जनता इस विधेयक के साथ है। मेरी राय है कि जनता विधेयक के साथ नहीं है। इस संबंध में पहले ही बड़ी संख्या में आपत्तियाँ प्राप्त हो चुकी हैं। मेरा विश्वास है कि विधानसभा के कार्यालय में, आपत्तियों की बाढ़ आ गई है और उनकी मात्रा इतनी अधिक है कि उन्हें वर्गींकृत अथवा सार रूप में नहीं रखा जा सकता या किसी सुव्यवस्थित तरीके से निपटाया भी नहीं जा सकता। आपत्तियां अभी भी बड़े विशाल पैमाने पर प्राप्त हो रही हैं। इससे जनता की भावनाओं की तीव्रता का पता चलता है। प्रश्न यह है कि क्या एक लोकतांत्रिक समाज में, एक लोकतांत्रिक आधार पर गठित विधायिका में हमें जनता की राय प्राप्त किए बिना ऐसा कानून पिरत कर देना चाहिए? जैसा कि मैं कह रहा था विधेयक की अपनी अवधारणा एक बाहरी सरकार की देन थी, जो इस संकल्पना के समय से ही अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही थी और उसी में व्यस्त थी। इस विधेयक को सदन में एक ऐसे कानून मंत्री द्वारा प्रस्तुत किया गया था, जो उस समय अंतरिक सरकार के एक मंत्री थे, और स्वयं वह पाकिस्तान पलायन करने का प्रयास कर रहे थे। इसलिए उन्हें इस विधेयक में बिल्कुल भी रुचि नहीं थी।

श्री एच.पी. कॉमथः वह उसी बात को दोहरा रहे हैं, जो उन्होंने सुबह कही थी।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः अब वर्तमान विधेयक माननीय मंत्री, डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तुत किया गया है, जबकि भारत में बड़ी संख्या में गंभीर समस्याएं हैं। इससे प्रमाणित हो जाता है, जैसा कि कानून मंत्री की स्वीकारोक्ति से भी प्रतीत होता है, कि वर्तमान विधेयक किसी विचार के बिना मात्र पूर्ववत जारी रखा गया है। यह तब की बात है, जब इसे प्रवर