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तो स्पष्ट होगा कि जनता की जो राय ली गई, वह प्रचुर मात्रा में हिंदू संहिता के विरुद्ध थी। इसका परिणाम यह हुआ कि हिंदू कानून समिति ने अपने निजी दृष्टिकोणों का पालन किया और विधेयक में यहां-वहां संशोधन कर दिए, जो जनता की राय के अनुरूप नहीं थे। इसके बावजूद कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश डी.एन. मित्तर, जो एक सदस्य भी थे, के द्वारा अपनी असहमति टिप्पणी में इस साक्ष्य का बहुत सावधानीपूर्वक विश्लेषण किया गया है। वास्तव में, उन्होंने एक व्यापक असहमति टिप्पणी लिखी है। मैं इस मामले पर बात नहीं करना चाहता, किन्तु उन्होंने विभिन्न शीर्षों के अंतर्गत इस राय का विश्लेषण किया, अर्थात् क्या हमें कोडिफिकेशन की आवश्यकता है अथवा नहीं, क्या विवाह कानून को बदला जाना चाहिए, क्या तलाक होने चाहिए, आदि। उन्होंने प्रत्येक शीर्ष में राय और साक्ष्य का, उनके पक्ष और विपक्ष में विश्लेषण किया है, और मेरा कहना है कि सदन द्वारा उनकी वह रिपोर्ट बहुत सावधानीपूर्वक विचार-विमर्श किए जाने की अपेक्षा रखती है। विभिन्न रायों को पुनः विषयों के अनुरूप के साथ-साथ प्रान्तों के अनुरूप वर्गीकृत किया गया है। डॉ. डी.एन. मित्तर के अनुसार, साक्ष्य के प्रभाव के संबंध में, कोडिफिकेशन, तलाक की कार्यवाहियों और अन्य मामलों के बारे में प्रत्येक बिंदु पर राय प्रचुर मात्रा में विधेयक के विरुद्ध थी। जनता की राय कोडिफिकेशन के सीधे विरुद्ध थी। यानी जनता की राय और साक्ष्य प्रचुर मात्रा में विधेयक के सिद्धांतों के विरुद्ध थे। हिंदू कानून समिति की रिपोर्ट केवल बहुमत की रिपोर्ट है। डॉ. डी.एन. मित्तर द्वारा वस्तुतः इसका विरोध किया गया था, परन्तु अन्य सदस्यों ने सोचा कि उनके मूल विधेयक में यहां-वहां थोड़े संशोधन करके इनमें फिट किया जा सकता है। वे संशोधन जनता के राय के अनुरूप नहीं थे, बल्कि वे संशोधन उनकी अपनी सोच के अनुरूप थे। अतः मैं कहता हूँ कि विधेयक को जनता की राय के विपरीत तैयार किया गया है। यही वह आधार है जिस पर मेरा तर्क टिका है। यद्यपि श्री कृष्णास्वामी भारती ने कहा है कि विधेयक के पीछे जनता की राय है, पर मैं यह बताने का साहस कर रहा हूँ कि जनता की राय इसके विरुद्ध है।
एक माननीय सदस्यः एक प्रश्न।
श्री तजामुल हुसैनः नहीं, विल्कुल नहीं। यह विधेयक के लिए है।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः जहाँ तक लिखित राय का संबंध है, यह वास्तव में विधेयक के विरुद्ध है।
इस प्रकार, मेरा कहना है कि जनता की राय पर उचित विचार किया गया, जैसा कि एक लोकतांत्रिक सरकार को करना चाहिए। वस्तुतः यह विधेयक लोकतंत्र को नकारने