हिंदू विवाह वैधता विधेयक - Page 71

56 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अपनी योग्यता से और प्रत्येक व्यक्ति अपनी आवश्यकता के अनुसार’ इसे स्वीकार करता है। अन्य शब्दों में यह कहा जा सकता है कि एक व्यक्ति कम से कम सम्पत्ति का आनन्द उठाता है। उसे अपनी वैयक्तिक स्थिति को दूसरों के लाभार्थ लगाना है। उसे यह कभी नहीं सोचना है कि सम्पत्ति में उसका नितांत वैयक्तिक हित है। यदि यही आधारभूत समझ है और यदि प्रगतिशील विचारों का संसार इस दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो मेरा विश्वास है कि यह स्वीकार किया जाएगा कि इसकी विपरीत दिशा में जाना एक भूल होगी। इस प्रकार के विचार को प्रोन्नत करने के लिए हर समय प्रयास किया जाना चाहिए और इस प्रकार की संस्थाओं को भी प्रोन्नत किया जाना चाहिए, जो उस प्रकार का विचार प्रोत्साहित करती हैं। डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषण में सविस्तार उन प्रयत्नों पर प्रकाश डाला है जो अब तक स्मृतिकारों और अन्य व्यक्तियों ने किए हैं ताकि सह-समांशी का विचार समाप्त किया जा सके। यह मानकर कि ऐसा है, अब विपरीत दशा में प्रयत्न करना चाहिए ताकि नष्ट करने की प्रक्रिया को पूरा न किया जा सके, अपितु सह-समांशी सम्पत्ति का पुनरुद्धार किया जा सके।

श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः असंभव।

श्री वी.एस. सरवतेः असंभव? जी हाँ, ऐसी प्रत्येक बात, जिसके बारे में प्रयत्न नहीं किया जाता, ‘असंभव’ कह कर टाल दी जाती है।

यदि आप प्रयत्न करें तो इस विश्व में कुछ भी असंभव नहीं है। इसलिए अब मैं निवेदन करता हूँ कि सह-समांशी सम्पत्ति प्रणाली का विचार स्वीकार किया गया है। प्रत्येक वैयक्तिक सदस्य अथवा सह-समांशी उभयनिष्ठ सम्पत्ति का पूर्ण रुपेण आनन्द उठा सकता है, यद्यपि उस सम्पत्ति में उस व्यक्ति का एकमात्र अधिकार नहीं होता तथा वह उसमें अपने हित को हस्तांतरित नहीं कर सकता। इसलिए जब आप इसके बारे में सेचते हैं, तो आपको कुल मिलाकर सह-समांशी के विचार को स्वीकार करना चाहिए। संयुक्त सम्पत्ति का विचार जैसा कि मिताक्षर में दिया गया है, ऐसा ही प्रतीत होता है कि उसमें उत्तराधिकार का अधिकार है, तथा उसमें व्यक्ति को इकाई नहीं माना जाता अपितु प्रत्येक परिवार को इकाई माना जाता है। इसका अर्थ यह भी है कि उसमें परिवार वैयक्ति रूप से आगे बढ़ता है तथा चाहे पुरुष हो अथवा महिला, प्रत्येक को उपभोग का समान अधिकार रहता है। कहने का अर्थ है कि समानता की दृष्टि से लिंग कुछ भी क्यों न हो, व्यक्ति के अधिकार समान होते हैं। इसलिए इसका अभिप्रायः यह है कि परिवार की सम्पत्ति कुछ भी क्यों न हो, वह सम्पत्ति उन्हीं व्यक्तियों में हस्तांतरित की जाएगी, जो परिवार बनाते हैं। इसलिए यदि बेटी परिवार नहीं बनाती, यदि वह किसी अन्य परिवार की सदस्य है तो वह निश्चित रूप से उस परिवार में किसी भी प्रकार का अधिकार-सुख नहीं पा सकेगी। यह बेटी के लिए लापरवाही अपना अनुचित व्यवहार या स्नेह की कमी नहीं है। संयुक्त परिवार का मूल विचार यह है कि जो भी सदस्य हो, चाहे वह विधवा हो, पुरुष या महिला हो,