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यदि वह परिवार का सदस्य है तो उसे (पुरुष या महिला) परिवार की सम्पत्ति का उपयोग करने का अधिकार है तथा उस सम्पत्ति को कोई अन्य हस्तांतरित नहीं कर सकता। मैं इस संबंध में एक प्रभावी उपबंध का स्वागत करूँगा कि संयुक्त पारिवारिक संपत्ति का विभाजन नहीं किया जाएगा और कि किसी व्यक्ति अथवा परिवार के सदस्य को उस सम्पत्ति के हस्तांतरण का अधिकार नहीं होगा। इस स्थिति का अधिक स्वागत किया जाएगा तथा इसकी सही दिशा की सराहना भी की जाएगी। यह उस विचार के अनुसार है जो संयुक्त परिवार प्रणाली के पीछे सैद्धांतिक रूप से है। यह परिवार ही है जिसे समाज में इकाई के रूप में स्वीकार किया जाता है तथा व्यक्ति को एक इकाई नहीं समझा जाता। इस दृष्टिकोण से विचार करने पर, किसी भी बहन को यह सोचने की आवश्यकता नहीं है कि उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया गया है, क्योंकि इस मामले में वह और उसका भाई समान अधिकार का सुख उठाते हैं। इसलिए मैं डॉ. अम्बेडकर के विचारार्थ यह निवेदन करूँगा कि भारत जैसे विशाल देश में कुछ भी नष्ट नहीं होगा, यदि सामाजिक इकाइयों के अनुसार अलग-अलग प्रयोग किए जाते हैं। यदि इस बात की आवश्यकता है कि व्यक्ति को इकाई होना चाहिए तो कहीं पर यह प्रयोग किया जाए। यदि संयुक्त परिवार को समाज की इकाई होना है, तो अन्यत्र यह भी प्रयोग हो। हम एक विशाल देश के लोग हैं, समाज में विविध प्रकार के प्रयोग किए जाने के लिए दोनों प्रयोगों को चलने दें और लोगों को ऐसे कानून अथवा प्रणाली का चयन करने दें, जिसका वे अनुसरण करना चाहते हैं। अतः यदि भारत के 20 करोड़ लोगों के लिए संहिताबद्ध समान कानून के स्थान पर एक से अधिक प्रणाली जारी रखें, तो कोई हानि नहीं होगी।
मैं इस संबंध में डॉ. अम्बेडकर द्वारा किए गए अवलोकनों में से एक अवलोकन की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा। मैं उनकी विद्धता की प्रशंसा करता हूँ। मैंने उन्हें आदरपूर्वक सुना है, क्योंकि अपनी दलीलों से वे किसी पर झपटने के स्तर तक कभी नहीं गए। उन्होंने जोरदार शब्दों में प्रतिवाद किया, परन्तु वे सीधे एवं स्तरीय प्रहार थे। परन्तु एक दिन उनके प्रतिवाद तीखे रहे जबकि उनका भाषण पारदर्शी था। उन्होंने कहा था कि वे नहीं जानते, प्राचीन काल में ब्राह्मण इतनी अधिक जैसे 137 स्मृतियां तैयार करने में क्यों लगे रहे और डॉ. अम्बेडकर का प्रश्न था कि क्या उन ब्राह्मणों के पास कोई दूसरा काम नहीं था। मैं विश्वास करता हूँ जब माननीय मंत्री ने यह कहा, उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि उस क्षण उनसे अलग हो गयी थी। मैं उन्हें याद दिलाना चाहता हूँ कि ये 137 स्मृतियां एक साथ नहीं लिखी गई थीं। वे कम से कम 250 वर्षों से अधिक अवधि में लिखी गई थीं। इस प्रकार प्रत्येक स्मृति के लिखने में उन्हें लगभग 20 वर्ष लगे। इसका अर्थ यह है कि एक स्मृति एक पीढ़ी के लिए लिखी गई। परन्तु यहां क्या होता है कि वह एक वर्ष के अन्तराल में माननीय डॉ. अम्बेडकर एक से अधिक स्मृतियां तैयार कर लेते हैं। अतः उन्हें ऐसे अशिक्षाप्रद आकलन से बचना चाहिए। यह उनके तर्क की दृष्टि से भी अनावश्यक था।