भाग 3 - दत्तकग्रहण - Page 710

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(ख) यदि जोर-जबरदस्ती, गैर-जरूरी प्रभाव, गलतबयानी या गलती, जैसा भी

मामला हो, के सामने आने के बाद भी सहमति देने वाला दत्तकग्रहण की

पुष्टि करता है, और ऐसी पुष्टि से किसी अन्य के अधिकार पर असर न

पड़ता हो।

(3) जहां उप-खंड (2 )के धारा ‘क’ में दी गई समय-सीमा के भीतर कोई मुकदमा

दायर नहीं होता और जहां उक्त उप-खंड की धारा ‘ख’ के तहत दत्तकग्रहण की

पुष्टि की जाती है वहां दत्तकग्रहण की तिथि से सभी उद्देश्यों के लिए उसे प्रभावी

व वैध माना जाएगा।

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अध्याय 2
दत्तकग्रहण के प्रभाव

67. दत्तकग्रहण के प्रभावः एक दत्तक पुत्र दत्तकग्रहण की तिथि से दत्तक परिवार में सभी उद्देश्यों के लिए दत्तक पिता का पुत्र मान लिया जाता है और उसी तिथि से उसके सारे संबंध जन्म के परिवार से अलग हो जाते हैं और वह दत्तक परिवार में दत्तकग्रहण से प्रतिस्थापित हो जाते हैं।

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(क) वह बालक किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह नहीं कर सकेगा जिस से वह यदि

अपने जन्म के परिवार में होता, विवाह नहीं कर पाता।

(ख) जो कोई संपत्ति, दत्तक पुत्र में दत्तकग्रहण के पूर्व निहित हो गई थी, इस

शर्त पर उसमें निहित रहेगी कि उस संपत्ति से जुड़ी कोई जिम्मेदारी, यदि

कोई हो तो, इसमें उसके जन्म के परिवार के संबंधियों के भरण-पोषण करने

की जिम्मेदारी भी शामिल है, भी उसकी होगी_

(ग) दत्तक पुत्र, जो सम्पदा दत्तकग्रहण के पूर्व उसमें निहित थी, उसे किसी व्यक्ति

को सिवाय धारा 68 में दिए गए तरीके व सीमा के, अनिर्निहित नहीं कर

सकेगा।

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68. दत्तकग्रहण द्वारा संपत्ति को निर्निहित करनाः जहां इस संहिता के प्रभावी होने के बाद कोई विधवा दत्तकग्रहण करती है तो वह दत्तक पुत्र -