696 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
(क) दत्तक पुत्र होने के नाते वह विधवा व अन्य विधवाएं यदि कोई हों, की संपत्ति में
आधे का स्वामी होगा जैसे दत्तक पिता का उत्तराधिकारी को होता है। (ख) यदि दत्तकग्रहण ग्रहीता पिता के पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र की मृत्यु के पश्चात् हुआ हो तो
आधी संपत्ति ग्रहीता माता और यदि अन्य विधवाएं, यदि कोई हों जो वह ग्रहीता
पिता से प्राप्त करती है, इसके अतिरिक्त, आधी सम्पत्ति उन पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र का
उत्तराधिकारी होने के नाते ग्रहीता माता प्राप्त करतीः
हर मामले में संपति में हिस्सा वैसा ही होगा जैसा कि दत्तक ग्रहण से ठीक पहले थाः-
बशर्ते कि यदि सारी संपत्ति या उसका एक हिस्सा जो उसे या उन्हें विरासत में परम्परा, रीति-रिवाज अथवा किसी अनुदान या कानून द्वारा अविभाज्य रूप से मिला हो, दत्तक पुत्र उस पूरी जागीर को अविभाज्य ही रहने देगा जैसा कि दत्तक ग्रहण से ठीक पहले था इसके साथ ही खंड क या ख के तहत प्राप्त सम्पत्ति का वह अधिकारी हो सकता है।
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अध्याय 2
दत्तकग्रहण के प्रभाव
67. दत्तक ग्रहण के प्रभावः एक दत्तक पुत्र दत्तकग्रहण की तिथि से ग्रहीता परिवार में सभी उद्देश्यों के लिए ग्रहीता पिता का पुत्र मान लिया जाता है और उसी तिथि से उसके सारे संबंध जन्म के परिवार से अलग हो जाते हैं और वह दत्तक ग्रहीता परिवार में दत्तक ग्रहण से प्रति स्थापित हो जाते हैंः
बशर्ते किµ
(क) वह बालक किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह नहीं कर
सकेगा जिस से वह यदि अपने जन्म के परिवार में
होता, विवाह नहीं कर पाता_
(ख) जो कोई संपत्ति, दत्तक पुत्र में दत्तक ग्रहण के पूर्व निहित
हो गई थी, इस शर्त पर उसमें निहित रहेगी कि उस
संपत्ति से जुड़ी कोई जिम्मेदारी, यदि कोई हो तो, इसमें
उसके जन्म के परिवार के संबंधियों के भरण-पोषण
करने की जिम्मेदारी भी शामिल है, भी उसकी होगी_ (ग) दत्तक पुत्र, जो सम्पदा दत्तक ग्रहण के पूर्व उसमें निहित
थी, उसे किसी व्यक्ति को सिवाय धारा 68 में दिए
गए तरीके व सीमा के, अनिर्निहित नहीं कर सकेगा।
भाग 6, खंड 18, पृष्ठ 27