हिंदू विवाह वैधता विधेयक - Page 73

58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

श्रीमान, मैं संयुक्त परिवार की सम्पत्ति की बात कर रहा था। मेरा निवेदन है कि संयुक्त परिवार की सम्पत्ति का सिद्धांत यह है कि उसमें प्रतिबंधित उपभोग की अनुमति होती है।

महाशय, प्रायः यह प्रश्न पूछा जाता है कि हिंदू संस्कृति क्या है, हिंदू धर्म वस्तुतः क्या है? जहां देवदूत आगे आने में डरते हों, वहां मुझ जैसा व्यक्ति तेजी से आगे बढ़ने आया है। इसके लिए व्यक्ति कभी-कभी अस्थायी प्रयत्न करता है और मैं भी ऐसा प्रयत्न करूंगा। मेरे विचार से जहां तक इस विषय का संबंध है कि ऐसे सैद्धांतिक विषय उन्हें हिंदुओं ने अपने समक्ष रखा है, सर्वथा उपभोग पर अंकुश लगाने के बारे में हैं। उपभोग को प्रोत्साहन देने के स्थान पर उपभोग पर अंकुश लगाना ही उनका सिद्धांत था और उनके अनुसार अपने समुदाय की भलाई के लिए, व्यक्ति को स्वयं पर अंकुश लगाना चाहिए।

अब उक्त अंकुश के सिद्धांत को लागू करते हुए मैं निवेदन करता हूँ कि विवाह के पूरे अध्याय को फिर लिखा जाना चाहिए। इस संबंध में यह कहा गया है कि रिवाजों के अनुसार 90 प्रतिशत लोग तलाक का अधिकार रखते हैं, आप नया क्या कर रहे हैं? यह पूछा जा सकता है कि आप शेष दस प्रतिशत पर भी नब्बे प्रतिशत लोगों के रिवाज को थोपना चाहते हैं? मैं कहता हूँ, इस प्रकार की दलील प्रस्तुत एक उत्तम वाक्पटुता है, परन्तु यह तर्कसंगत नहीं है। हमें क्या विचार करना है और माननीय डॉक्टर साहब को क्या सोचना है, वह यह नहीं है कि रिवाज़ क्या है, परन्तु अपितु सोचना यह है कि अच्छा क्या है और लाभकारी क्या है। हमें यह विचार करना है कि वहां क्या होना चाहिए। यह कसौटी हमेशा रही है और यही कसौटी होनी चाहिए। अन्यथा विषमता बनी रहगी। उदाहरण के लिए, नम्बे प्रतिशत लोगों को शराब पीने की आदत होती है। हम निश्चित ही मद्य-निषेध को रोकने के लिए नहीं हैं, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि पीने का अपितु सोचना यह है कि रिवाज़ है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः यह रिवाज़ नहीं है।

श्री वी.एस. सरवतेः ठीक है, आप ऐसा सोच सकते हैं, पर मुझे स्वतंत्रता है कि अपने तरीके से अपना विचार व्यक्ति करूँ। ( एक माननीय सदस्यः ‘नब्बे प्रतिशत लोग शराब पीने वाले नहीं हैं।’) एक बात यह है कि इसे किसी समुदाय में रिवाज़ माना जाए और दूसरी बात यह है कि उन्हें पीने वाले समझा जाए। यही अंतर है। यह कहने की कोई दलील नहीं है कि किसी प्रकार का रिवाज़ है, अतः कानून द्वारा इसका परिपालन किया जाना चाहिए। तर्क यह होना चाहिए कि क्या यह लाभप्रद है और यदि इस दृष्टिकोण से विचार करते हैं और हिंदू समुदाय का अमुक वर्ग यह कहता है कि विवाह अविघटनीय है, तो उन्हें क्यों बाध्य किया जाए और यह कहा जाए कि विवाह विघटन होगा, यदि दोनों पक्ष ऐसा करना चाहें। इस बारे में दलील आगे दी जा सकती है कि इस विधेयक