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(ख) न्यायालय प्रक्रिया को परखेगा और उसके पास उस अधिनियम की धारा 31
की उप-धारा (2) (3) व (4) में बताए गए अधिकार होंगे_ व
(ग) इस धारा की उप-धारा (2) में बताए किसी कार्य के लिए न्यायालय आवेदन
को ठुकराता है तो प्राकृतिक संरक्षक उच्च न्यायालय में अपील कर सकता
है।
(6) इस धारा में ‘‘न्यायालयय् से अभिप्राय स्थानीय सीमा के दायरे में स्थित जिला
न्यायालय है जहां उस अचल संपत्ति या उसका कोई भाग है, जिसके संबंध में,
आवेदन किया गया है, स्थित है अथवा गार्जियन एंड़ वाडऱ् एक्ट, 1890 (1890
का VIII ) की धारा 4ए के तहत अधिकार प्राप्त कोई न्यायालय है।
(84)
80. स्वाभाविक संरक्षक की शक्तियांः
(1) इस धारा के प्रावधान के अधीन एक हिंदू अवयस्क के
स्वाभाविक संरक्षक को वे सभी कार्य करने का अधिकार
है जो अवयस्क के लाभ अथवा उसकी संपत्ति की प्राप्ति,
सुरक्षा या लाभ के लिए आवश्यक अथवा उचित व सही हो
किंतु किसी भी मामले में संरक्षक अवयस्क को व्यक्तिगत
इकरारनामे में नहीं बांध सकता।
(2) न्यायालय की पूर्व आज्ञा के बिना प्राकृतिक संरक्षक नहीं कर
सकता-
(अ) अवयस्क की अचल संपत्ति के किसी भाग को बंधक
या शुल्क, या बिक्री, उपहार, अदल बदल या किसी
अन्य तरीके से हस्तांतरित या _
(ब) ऐसी संपत्ति के किसी भाग को पांच वर्ष से ज्यादा समय
या अवयस्क के वयस्क होने की तिथि के एक साल
से ज्यादा समय के लिए पट्टे पर नहीं दे सकता।
(3) प्राकृतिक संरक्षक द्वारा उपधारा 1 अथवा 2 के उल्लंघन के
फलस्वरूप अचल संपत्ति के लिए की गई कोई व्यवस्था
शून्य हो जाएगी यदि उससे अवयस्क या अन्य कोई प्रभावित
होता हो।