708 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
(4) उप-धारा (2) में कहे किसी कार्य के लिए न्यायालय प्राकृतिक
संरक्षक को आज्ञा नहीं दे सकता बशर्ते वह आवश्यक हो या
अवयस्क की भलाई के लिए हो।
भाग 5, खंड 6, पृष्ठ 23
(5) उप-धारा (2) के तहत न्यायालय से आज्ञा के लिए दी गई अर्जी के संबंध में द
गार्जियंस एंड वार्ड एक्ट, 1890 (1890 का VIII ) लागू होगा, और इस संबंध में
आज्ञा के लिए दी गई अर्जी ऐसे मानी जाएगी जैसे वह उस एक्ट की धारा 29के
तहत है, विशेषतः-
(अ) आवेदन के संबंध में सुनवाई को उस अधिनियम की धारा 4अ के अर्थ के
दायरे में समझा जाएगा_
(ब) न्यायालय प्रक्रिया को परखेगा और उसके पास उस अधिनियम की धारा 31
की उप-धारा (2) (3) व (4) में बताए गए अधिकार होंगे_ व
(स) इस धारा की उप-धारा (2) में बताए किसी कार्य के लिए न्यायालय आवेदन
को ठुकराता है तो प्राकृतिक संरक्षक उच्च न्यायालय में अपील कर सकता
है।
(6) इस धारा में ‘‘न्यायालयय् से अभिप्राय स्थानीय सीमा के दायरे में स्थित जिला
न्यायालय है जहां उस अचल संपत्ति या उसका कोई भाग है, जिसके संबंध में,
आवेदन किया गया है, स्थित है अथवा गार्जियन एंड़ वाडऱ् एक्ट, 1890 (1890
का VIII ) की धारा 4ए के तहत अधिकार प्राप्त कोई न्यायालय है।
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81. प्राकृतिक संरक्षक द्वारा अधिकार का निरसनः जहां किसी हिंदू अवयस्क का प्राकृतिक संरक्षक किसी अन्य व्यक्ति को अवयस्क का अधिकार सौंपता है, तो ये रद्द करने योग्य है सिवाय वहां-
भाग 5, खंड
(क) जहां इस तरह रद्द करने की आज्ञा अवयस्क के हित 6, पृष्ठ 23 में न हो_ अथवा
(ख) जहां प्राकृतिक संरक्षक िंहंदू न रहा हो_ अथवा
(ग) जहां किन्हीं अन्य पर्याप्त कारणों से इस तरह की आज्ञा देना अवयस्क के
लिए वांछनीय न हों।