60 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री वी.एस. सरवतेः सिविल विवाह का अर्थ तलाक नहीं है। इसका अर्थ विवाह-विच्छेद अथवा तलाक नहीं है। जब मैं सिविल विवाह कहता हूँ तो उसका अर्थ विवाह है_ उसका अर्थ तलाक नहीं है।
श्री महावीर त्यागीः इसका अर्थ विवाह भी नहीं है।
माननीय अध्यक्षः शांत, शांत। माननीय सदस्य अपना भाषण जारी रखें।
श्री वी.एस. सरवतेः श्रीमान, मेरा निवेदन हैः हमें अपने दिमाग में स्पष्ट होना चाहिए कि क्या हम कुछ ऐसी बातें थोपना चाहते हैं जो कुछ लोग नहीं चाहते? मैं इससे आगे की बात कहता हूँ, जब एक बार आप सांस्कारिक विवाह को स्वीकार कर लेते हैं कि यह सांस्कारिक है। तब ऐसे विवाह के लिए परिस्थियां उपलब्ध कराने के धार्मिक प्रावधानों का परीक्षण हो। यदि कोई धर्म, बाल-विवाह और अल्प-वयस्कों के विवाह की अनुमति देता है, तो ऐसे विवाहों की अनुमति हो। यह प्रथमः शर्तों का विरोधाभास है जब यह कहा जाता है कि विवाह धर्म के अनुसार होना चाहिए और तब उसमें यह बात जोड़ दें कि यह धर्म के अनुसार होना चाहिए और साथ ही विधेयक के प्रावधान अनुसार भी। यह शर्तों का विरोधावास ही है। या तो सांस्कारिक विवाहों को अनुमति हो अथवा न हो, यदि आप उसे पसंद नहीं करते। ऐसी दशा में जब सभी विवाह सिविल विवाह हों। यदि आप कहते हैं कि सांस्कारिक विवाहों की अनुमति दी जाती है, तब संस्कारों के अनुसार विवाह सम्पन्न किए जाएं। यह मेरा विनम्र विचार है और जहां तक खंड 7 के उपबंधों का संबंध है, वे संस्कारों के अनुसार नहीं हैं। संस्कार के साथ कुछ अन्य बातें जोड़ी जाती हैं। वह धर्म के अनुसार ही होना चाहिए, यदि धर्म को अनुमति देना है। यह दूसरी बात है जो मैं आपके ध्यान में लाना चाहता हूँ और इसे आसानी से किया जा सकता है। उससे संतुष्ट करेगा और काफी हद तक असंतोष के कारण दूर करेगा जो इस समय मौजूद हैं। सिद्धांतों की दृष्टि से मेरा मात्र सुझाव यह है कि इसी अधिनियम में इसका प्रावधान किया जाना चाहिए जो समाज को अनुमति दे कि सह-समांशी के रूप में परिवार बना रहे। इससे कुछ भी नष्ट नहीं होगा। इस देश में मुसलमान हैं, ईसाई हैं और पारसी हैं। पारसियों का बहुत छोटा समुदाय है, यदि उन्हें उत्तराधिकार आदि का अपना कानून अपनाने की अनुमति है, तब एक बड़े वर्ग को सह-समांशी को अनुमति दी जाती है यदि वे ऐसा चाहें। यदि इस सिद्धांतं को एक बार स्वीकार कर लिया जाता है, तो उस सिद्धांत के अनुसार पूरे मसौदे में परिवर्तन किए जा सकते हैं।
मेरा आगे निवेदन है कि यह विधेयक अभिमत के लिए पुनः परिचालित किया जाए। यहां, मैं उस आदेश की बात नहीं उठाता, जो अध्यक्ष ने पहले ही दे दिया है। प्रश्न उठा था कि क्या नियमों के लिए प्रकाशन पर्याप्त था और आदेश था कि यह पर्याप्त था यद्यपि मुझे इस बात को उठाने में वंचित नहीं किया जा सकता कि क्या यह वांछनीय है कि विधेयक को प्रचार-प्रसार किया जाए। मेरा निवेदन है कि इस बात का कोई अर्थ