हिंदू विवाह वैधता विधेयक - Page 76

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नहीं होगा कि यदि विधेयक पारित हो जाता है, तो वह स्वतः प्रांतों पर लागू होगा, चाहे डॉ. अम्बेडकर इसके विपरीत कुछ भी क्यों न कहें। मेरा नम्र निवेदन यह है कि यह राज्यों के उन सभी राज्य-क्षेत्रों में लागू होगा, जो प्रान्तों में सम्मिलित कर दिए गए हैं और उन सभी क्षेत्रों में जो सहमत हैं, केन्द्र के द्वारा उनके लिए कानून बनाने को।

श्री सीता राम एस. जाजू (मध्य प्रदेश)ः यदि इसे भारतीय रियासतों में भी लागू किया जाए, तो इसमें आपत्ति क्या है?

श्री वी.एस. सरवतेः मैं यही कह रहा हूँ कि इसे लागू किया जाना चाहिए। मैं इसके पक्ष में हूँ। मैं नहीं समझता कि माननीय सदस्य मुझे बोलने की अनुमति दिए बिना ही मेरे बारे में पूर्वानुमान किए जा रहे हैं और कुछ टिप्पणियां कर रहे हैं। मैं निवेदन कर रहा था कि यह विधयेक भारतीय रियासतों पर लागू किया जाना चाहिए। लेकिन मैं केवल यह निवेदन कर रहा था कि यदि इसे ऐसे लागू किया जाता है और यह मेरी उत्कट इच्छा है, जब वहां एक सैद्धांतिक अधिकार का प्रश्न उठता है, जो आप न्याय की दृष्टि से प्रत्येक वृहद क्षेत्र को दे सकते हैं, जिसे आपके विधेयक के अधीन अधिशासित होना है अपना अभिमत व्यक्त करने। यह विधेयक अभी उन बड़े क्षेत्रों में प्रकाशित नहीं किया गया है और इसलिए वहां के लोग ऐसी स्थिति में नहीं थे कि इस विधेयक के बारे में गंभीरता से विचार कर सकें, जो कि वे अन्यथा कर सकते थे। अब जब उन्हें यह विहित है कि यह विधेयक उन पर लागू किया जाएगा और यह विधेयक प्रकाशित है, जो वे इस स्थिति में होंगे कि अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकें। प्रत्येक व्यक्ति का यह सैद्धांतिक अधिकार है कि उसे ऐसे विधान के बारे में अपना मत व्यक्त करने का अवसर प्रदान किया जाए, जो उसे प्रभावित करेगा। इसके आगे, यह उनके प्रत्येक प्रतिनिधि का कर्तव्य है कि वह इस सदन में मत प्रदान करने से पूर्व उन लोगों के विचार जान ले। इसलिए राज्यों के प्रतिनिधियों के विचार और राज्य लोगों के विचारों के दृष्टिकोण, दोनों ही प्रकार से यह न्यायसंगत है कि उन्हें अपने मत प्रकट करने के लिए कुछ समय दिया जाए, ताकि वे अपने अभिमत व्यक्त कर सकें। इसलिए मैं एक मध्यम मार्ग का सुझाव देता हूँ कि किसी भी दशा में यदि इस विधेयक पर विचार इस सभा में पूरा नहीं होता और यदि किसी प्रकार की कोई आकस्मिकता है जिसके बारे में मेरा कहना है कि ऐसा हो सकता है, तब इस विधेयक के माननीय प्रस्तावक यह विचार कर सकते हैं कि क्या यह वांछनीय नहीं होगा कि बाद में किसी विशेष सत्र में इस पर विचार किया जाए। जो अवरोध कर सकता है, दो या तीन या चार महीने पर्याप्त होगा उन लोगों की प्रतिक्रियाएं जानने के लिए हों। मेरे विचार से यही न्यायसंगत होगा और प्रकाशन के उपबंधों की भावना के अनुसार भी। मैं यह देखने के लिए सदन से अपील करता हूँ कि क्या उसके लिए न्याय की आवश्यकता नहीं है। इससे यह अनुमान नहीं लगाना चाहिए कि संहिता के बारे में अन्तिम शब्द कह दिया गया है। यह हो सकता है कि एक सामान्य से सामन्य व्यक्ति भी अपने उन सुझावों के साथ