हिंदू विवाह वैधता विधेयक - Page 77

62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आगे आएं, जो विद्वान डॉक्टर के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं। यदि इस प्रकार अवसर दिया जाता है, तो न्याय के उद्देश्य की पूर्ति हो सकेगी और यह उपयोगी भी होगा।

श्रीमान, इसी निवेदन के साथ मैं अपना भाषण समाप्त करता हूँ।

श्री एच.वी. कामथः माननीय अध्यक्षख्...,

श्री बी. दास (उड़ीसाः सामान्य)ः श्रीमान, व्यवस्था का प्रश्न है कि क्या कोई अविवाहित पुरुष जिसने विवाह न किया हो और पुत्र पैदा नहीं किया है, अपने पूर्वजों को पिंड दान कर सकता है, इस विधेयक पर भाषण दे सकता है और इस बहस में भी योगदान कर सकता है?

माननीय अध्यक्षः इसमें व्यवस्था का कोई प्रश्न नहीं उठता। कोई भी जो हिंदू है, वह अपनी बात कह सकता है।

ऽश्री एच.वी. कामथः मैं व्यवस्था के प्रश्न का उत्तर देना चाहूँगा। श्रीमान, मैं दो अधिवक्ता-मित्रों और एक महिला मित्र के बाद बोलने के लिए खड़ा हूँ, मैं असहायता में परिश्रम कर रहा हूँ। मेरे पास न तो माननीय मित्र पंडित ठाकुर दास भार्गव और श्री सरवते जैसी कानूनी दलीलें और न मेरे माननीय मित्र रेणुका रे जैसी मधुर तर्किकता। जहां तक अधिवक्ताओं का संबंध है, मुझे विश्वास है कि मेरे माननीय मित्र विधि मंत्री उन पर ध्यान देंगे और उनकी दलीलों का जवाब देंगे जो उन्होंने आज अपने भाषणों में उठाई हैं। जहां तक श्रीमती रेणुका रे के भाषण का संबंध है, मैं मोटे तौर पर उनके कथन से सहमत हूँ और मेरे लिए आवश्यक नहीं है कि मैं उनकी किसी दलील का उल्लेख अपने प्रतिवाद के लिए करूँ।

मेरे माननीय मित्र श्री बी.दास ने व्यवस्था का प्रश्न उठाया था, जब मैं भाषण देने के लिए उठा था। मेरे विचार से उनके द्वारा उठाया गया व्यवस्था का प्रश्न मेरे पक्ष में जाता है। मैं महसूस करता हूँ कि इस सदन के समक्ष इस मुद्दे पर भाषण देने का मेरा दावा केवल इसीलिए बनता है क्योंकि मेरे पास न तो पत्नी है, न बच्चे हैं और न नाम के लिए सम्पत्ति है। मैं निष्पक्ष विचार से इस विषय को स्वीकार करता हूँ। हृदय की भावनाओं से उत्प्रेरित न होते हुए इस विधेयक के अधिकांश प्रावधान, विवाह और सम्पत्ति, दत्तक लेना तथा उत्तराधिकार के अन्तर्गत ऐसे मामलों से संबंधित हैं, जिन्हें हमारे प्रसिद्ध दार्शनिक के दो शब्दों में अभिव्यक्त किया जा सकता है, अर्थात् कामिनी और कंचन। इनमें से किसी से भी अभी तक भयाक्रांत न होने पर, आशा है कि मैं अलिस मान से इस विधेयक पर ज्यादा या कम तरीके से कुछ टिप्पणियां करके आपको और सदन को प्रसन्न करूँगा। अवश्य अरुचि न होते हुए अलिस भाव से।

ऽसीए. (विधा.) डी. खंड 2, भाग II, 25 फरवरी, 1949, पृष्ठ 934-36