हिंदू विवाह वैधता विधेयक - Page 78

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इस बीसवीं सदी में ईसा मसीह के बाद, जैसा कि हम सभी जानते हैं और गवाह रहे हैं। इतिहास के मंच पर उभर कर आ गई, एशिया में, साथ ही साथ यूरोप और अमेरिका में है। इस विश्व आंदोलन के लिए भारत और हिंदू समाज भी अपवाद नहीं रहे हैं। ऐसे सभी क्रान्तिकारी विप्लव भाग्यवश अन्तर्ग्रथित हैं, जो हमारे समय में खुल कर उभर रहे हैं तथा उन्नींसवीं शताब्दी के पुराने समाजों को परिवर्तित कर रहे हैं। साथ ही, पुरुषों और महिलाओं के अतीत को नए संबंधों में बदल रहे हैं। हमारे युग में महिलाओं की गतिशीलता का विशेष उल्लेख है जिन्होंने पुरुषों के साथ विश्व को आग में झोंक दिया है। ( एक माननीय सदस्यः परन्तु आप अपवाद हैं) और ने विश्व के पुनर्निमाण की दिशा में कुछ योजनाएं बनाने में सहायता की है। यहां आकर मैं पूछता हूँ कि पुरुष ऐसी मृतआत्मा से क्यों श्वास लेता है जो गौरव से उन्हें स्मरण नहीं करता और उल्लास भरे हृदय से महिलाओं की उल्लेखनीय और वीरता की उपलब्धियों को याद नहीं करता। उनकी दयनीय स्थिति, अनिभज्ञता और निरक्षता, सत्याग्रह कहे जाने वाले अहिंसा के क्षेत्र में तथा रक्त और लोहा, अग्नि और इस्पात के रक्तजित युद्ध-क्षेत्र में भी भाग लिया है। हाथ जो शिशु का झूला हिलाते हैं, उन्हीं हाथों ने ऐसी शक्ति दिखाई है, जो तलवार चला सकते हैं और इतने कोमल हो जाते हैं कि जब आवश्यकता होती है तो वे आक्रमण के विरोध में मंगलकामना के लिए उठते हैं। दूसरे क्षेत्र और प्रदेशों को परे रखते हुए, हमारे अपने भारत में हम सभी जानते हैं कि पुरुषों के साथ महिलाएं, यद्यपि आधुनकि युद्ध कला से अनभिज्ञ हैं और लाठी चलाने में अनमियस्त हैं तथा गोली चलाने और कारावास से अपरिचित हैं, किस तरह हजारों की संख्या में महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के झंडे तले एकत्र हुई हैं। यह कहानी सुविख्यात है, मैं भी इसे अधिक विस्तार से कह सकता हूँ। अतः तीव्र गति से विकसित सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में हमें इस मुद्दे को देखना है, जो सदन के समक्ष विचारार्थ है। कोई भी कानून शून्य में नहीं चल सकता अथवा विनिर्मित नहीं हो सकता और सामाजिक परिवेश की दृष्टि से कानून न तो अलग हो सकता है और न उससे अलग देखा जा सकता है जिसमें उसका जन्म हुआ है। सार रूप में किसी मसखरे की परिहासशील टिप्पणी भी है कि इस युग में महिलाएं संसद में बैठती हैं और बसों में भी खड़ी होती हैं। सारांश में कहा जा सकता है कि यह ऐसा क्रान्तिकारी परिवर्तन है, जिसने वर्तमान पीढ़ी को पीछे छोड़ दिया है। महाशय, मैं महसूस करता हूँ, मैं भी न्यूनाधिक राजनीतिक परिवाजक हूँ, मैं इस विधेयक के बारे में कुछ विचार प्रस्तुत करता हूँं।

मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि इस सदन में मेरे माननीय मित्र जो इस विधिकरण से तत्काल प्रभावित नहीं हैं, इस विधेयक में इतनी बड़ी रुचि ले रहे हैं। मेरे माननीय मित्र पुनः संदेहास्पद पंडित नजीरुद्दीन हैं और मैं महसूस करता हूँ, श्रीमान, कि यह शीर्षक नितांत असुरक्षित भी नहीं है। यदि श्रीमान, माउंटवेटन को 15 अगस्त, 1947 को पंडित कहा जा सकता है, तो मैं महसूस करता हूँ कि बर्मा के लार्ड माउंटवेटन से महाशय नजीरुद्दीन के पास ‘पंडित’ कहलाने का अधिकार अधिक है। कई ऐसे मित्र