हिंदू विवाह वैधता विधेयक - Page 79

64 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इस विधिकरण में विशेष रुचि ले रहे हैं और मैं इसे समय का शुभ संकेत के रूप में स्वागत करता हूँ तथा भविष्य के लिए भी शुभ कथन मानता हूँ, क्योंकि इस प्रकार हम सीधे एकीकृत समाज की सही दिशा में जा रहे हैं तथा बहुत जल्द ही हमारे समस्त देश के लिए एक समान सिविल संहिता होगी।

सदन के भीतर और बाहर के सदस्य जो पूर्णतया इस विधेयक के पक्ष में नहीं हैं और जो पूर्ण रूप से इस संबंध में आगे नहीं आना चाहते, उनमें से कुछ लोग स्मृतियों, शास्त्रों और हमारे धर्म का सहारा लेते हैं। श्रीमान ठीक है, धर्म क्या है? जब तक हम निर्णय नहीं कर लेते कि इस प्रश्न का उत्तर क्या है, हम न तो प्रशंसा कर सकते हैं और न रद्द कर सकते हैं। उस आधार की जिसका इस देश के कुछ लोग सहारा ले रहे हैं, इस मुद्दे पर धर्म! क्या यह अनुष्ठान और बाह्य-कार्यों तथा उत्सवों की केवल एक संहिता है या कुछ गहन तत्व है जिसका संबंध आत्मा, हृदय, मस्तिष्क और भावना से है? धर्म! शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत में इस प्रकार हैµ‘धर्म वह तत्व है, जिससे संसार को सहारा मिलता हैः ‘येवेदम धार्यते जगत।’ संसार मिलता है अर्थात् ‘जगत’ जिस तत्व से समर्थित होता है, वही धर्म है।

अब हम नहीं हैं यह पूछेंगे कि क्या कुछ उत्सवों, अनुष्ठानों और औपचारिक रिवाज़ धर्म बनाते हैं अथवा क्या यह इससे भी अधिक गंभीर बात है?

जहां तक स्मृतियों का संबंध है जो धर्म के साथ आपस में जुड़ी अथवा आपस में गुंथी हैं, मेरे माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर ने उस दिन कहा कि शायद 137 स्मृतियां हैं। यदि मैं सही नहीं हूँ तो वे मेरी भूल का सुधार कर दें। मुझे विश्वास है कि उन्होंने स्मृतियों की गिनती की है। जहां तक उपनिषदों का प्रश्न है, उनकी संख्या 108 बताई जाती है और अनेक उपनिषद अज्ञात हैं या खोजे नहीं गए हैं। स्मृतियां भी अधिक हो सकती हैं अज्ञात और न अब तक खोजी गईं। पर अब 138वीं स्मृति का भी पता लगा है। वे मुझे क्षमा करेंगे यदि मैं इस स्मृति का यहां उल्लेख करूं और यह उल्लेख सतही नहीं है, क्योंकि यह भी एक विधिकरण है, जो यद्यपि क्रांतिकारी नहीं है, उसने हमारे एक हिंदू सामाजिक संबंधों में परिवर्तन किए हैं। इसलिए मैं समान शब्दावली का प्रयोग कर सकता हूँ जैसा कि ऐसी अन्य हिंदू सामाजिक संहिताओं तथा सामाजिक पाठ्य-पुस्तकों पर लागू किया गया है जो पहले से हमारे लिए लिखे गए हैं। इसे हम 138वीं स्मृति कह सकते हैं। मैं इसे जैसे ‘भीम स्मृति’ कह सकता हूँ। मैं आशा करता हूँ कि डॉ. अम्बेडकर मुझे क्षमा करेंगे। यदि मैं इसे स्मृति कहकर संदर्भ दूँ। यदि मैं आन्दोलन के एक अन्य प्रतिपादक का नाम भी सम्मिलित करूं, जिसने मसौदा तैयार किया है तथा उसका विधेयक प्रस्तुत किया है, तो मैं जैसे नरसिम्हा का उल्लेख करूंगा। वह राड समिति है, जिसने इस विधेयक का नेतृत्व किया। अंततोगत्वा मैं इसे, ‘भीम स्मृति’ न कहकर ‘भीम नरसिम्हा स्मृति’ का नाम दूंगा।