70 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
लिए न्यायाधीश चुना गया हो तथा जिसने अपनी बौद्धिक क्षमता तथा निष्ठा के बारे में इतना विरल योगदान किया हो। उन्होंने अर्थात् उभय भारती ने शंकराचार्य के पक्ष में अपना अभिमत दिया। ( माननीय सदस्यः वाह-वाह।) उसके परिणामस्वरूप उनके पति सन्यासी बन गए तथा उनके प्रतिद्वन्दी के शिष्य हो गए। इसके बाद उनके विचार देश के परमोच्च सिद्धांत के रूप में स्वीकार किए गए। भारत की सांस्कृतिक विरासत ‘कलचरल हैरीटेज ऑफ इंडिया’, रामकृष्ण मिशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक में लेखक का कहना है कि यह कथन मूल लेखकों का नहीं है। इन शब्दों पर ध्यान दिया जाए कि यह कथन मूल लेखकों का नहीं है। सर्जनात्मक विचारकों के मुक्त विचारों के साथ, कृत्रिम विचार वाले समीक्षकों के साथ टीकाकारों, स्मृतिकारों ने नहीं, अपितु वे जिन्होंने टीकाएं लिखीं, जिन्होंने महिलाओं के अधिकारों के दमन के लिए लिखा और जिनके लिए उन्होंने उपेक्षा और भ्रम के साथ कठोर रूप में यह बात स्वीकार की और प्रचारित की।
श्रीमान, अब हमारे अधिकांश मित्र जो इस विधिकरण का विरोध कर रहे हैं, यहाँ मेरा आशय इस सदन से है, परन्तु जो सदन से बाहर हैं, वे धर्म के नाम पर डटे हुए हैं। उस दिन मैंने यह प्रश्न उठाया था, फ्धर्म क्या है?य् हिंदू संहिता समिति के विरोधियों द्वारा बाटें गए, पैम्फलेटों में से एक पैम्फलेट में हमें कुछ परामर्श दिया गया है और वह क्या है? वे एक पुराने श्लोक को उदधृत करते हैं। मैं सही तौर पर याद नहीं कर पाता कि यह कहां पर आता है, परन्तु पंचतंत्र में इसको उदधृत किया गया हैµ ‘नस सभा यत्र न सन्ति वृद्धः वृद्धन्ते पे न वदन्ति धर्मम्’, जिसका अर्थ हैµफ्वह न तो सभा है, न विधानसभा, जहां वृद्ध न हों।य्
एक मान्य सदस्यः किंतु इस सदन में अनेक वृद्ध व्यक्ति उपस्थित हैं।
श्री एच.वी. कामथः वह व्यक्ति वृद्ध नहीं है, जो धर्म की बात नहीं करता। श्रीमान, मुझे खेद है कि हिंदू संहिता समिति के विरोधी हमारे मित्रों ने वृद्ध का सही अर्थ नहीं समझा है- वृद्ध कौन है और वृद्ध कौन नहीं है। महाभारत में एक कहानी है। सारस्वत मुनि बारह वर्ष के युवा थे जब देश में अकाल पड़ गया और सभी वृद्ध ऋषि जो सरस्वती नदी के किनारे प्रायश्चित के लिए उपवास कर रहे थे, वे अपने जीवन को बचाने के लिए भाग खड़े हुए। वे अपना जीवन बचाना चाहते थे। उस समय वह युवा लड़का अपनी जगह खड़ा रहा और उसकी मां सरस्वति_ और यही कारण है कि सरस्वती ने उसे प्रातः मछलियां, दोपहर को मछलियां और रात को भी मछलियां खिलाईं और यही कारण है कि सारस्वत ब्राह्मण आज भी मछली खाते हैं। यह ब्राह्मण लड़का अकाल होते हुए भी अपनी जगह खड़ा रहा। कहानी में यह बताया गया कि उस भूमि में कई वर्ष तक अकाल रहा, यानी बारह वर्षों तक अकाल रहा, परन्तु हमारा युवक सारस्वत मुनि, विश्व के सारस्वतों के जनक, अपने स्थान पर तब तक खड़े रहे, जब अकाल समाप्त हो गया। तो ऋषि जो अपना जीवन बचाने के लिए भाग गए थे, वे अल्प संख्या में एक के बाद एक करके लौट