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आए और सरस्वती नदी के तट पर अपनी उस तपस्या के प्रारम्भ करने में फिर लग गए, जो अकाल द्वारा खंडित हो गई थी और उन्होंने इस 24 वर्षीय लड़के पर शासन करने का प्रयास किया। यह लड़का 12 वर्ष का था जब अकाल प्रारम्भ हुआ था और यह लड़का 24 वर्ष का हो गया, जब अकाल समाप्त हुआ। उन्होंने उस लड़के पर अधिकार जमाना प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने कहा, तुम हमारे चरणों में बैठो, हमसे अनुदेश प्राप्त करो, हमसे शिक्षा ग्रहण करो, हमारे शिष्य हो। उस लड़के ने कहा, फ्तुम पर धिक्कार है, यह शर्म की बात है कि तुम अपने को मुनि, ऋषि और तपस्वी कहते हो और तुम अपने जीवन को बचाने के लिए भाग खड़े होते हो। तुम मृत्यु के डर से भागते हो, तुम्हें मेरे चरणों में बैठना है और मुझसे शिक्षा ग्रहण करनी है। इस प्रकार उस 24 वर्षीय लड़के ने 70 या 80 वर्ष के वृद्धों से कहा आगे महाभारत में कहा गया हैः
फ्न तेन वृद्धों भवति येनस्य पलितय शिरः
यो वै मूलत्यध्यनस्तं देवः स्थिपिरभ स्वधुः।य्
इसका अर्थ हैµ
‘व्यक्ति वृद्ध नहीं होता यदि केवल उसके केश श्वेत हैं। यहां तक कि एक युवा लड़का जिसने अध्ययन किया है, देवताओं द्वारा ‘बुद्धिमान पुरुष’ माना जाता है।’ वही व्यक्ति वृद्ध है जिसने ‘वृद्धि’ प्राप्त कर ली है। वस्तुतः वृद्ध शब्द को अशुद्ध रूप से अधिक आयु का कहा गया है। उसका अर्थ यह है कि जिस व्यक्ति ने ‘वृद्धि’ प्राप्त कर ली है। उसे ही बुद्धि, संवृद्धि, विकास अर्थात् ‘वृद्धि’ माना जा सकता है।ख्...,
फ्न स सभा यत्र न सन्ति वृद्धः
वृद्ध न ते पे न वदन्ति धर्यम्।य्
मेरा विचारा है कि ‘वृद्धि’ या बुद्धिमता के अभिप्राय से यहां मेरे अनेक मित्र हैं, जो उस मानदण्ड पर खरे उतरेंगे। परन्तु हमारे कुछ मित्रों ने पूरे श्लोक को सारांश में उद्धृत करने से रोक दिया है। वे प्रारम्भ करते है कहकरः
फ्न स सभा यत्र न सन्ति वृद्धः
वृद्ध न ते मे न वदन्ति धर्मयो।य्
परन्तु धर्म क्या है? श्लोक में आगे बताया गया है कि धर्म क्या है। ये भिन्न सुविधा के लिए श्लोक के इस भाग को छोड़ देते हैं। श्लोक में कहा गया हैःµ
धर्मः स न पत्र न सत्यंस्ति।
वहां धर्म नहीं है जहां सच नहीं है। इसलिए मेरा उन लोगों के साथ झगड़ा है, जो धर्म का सहारा लेते हैं परन्तु उन्होंने नहीं समझा है कि ‘हिंदू धर्म’ क्या है।