(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 87

72 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मैं पुनः आपको बाध्य करूंगा कि आप सदन को यह बताएं कि हमारे महान विद्वान और दार्शनिक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन् इस विषय में क्या कहते हैं, विशेषकर ‘हिंदू धर्म’ के बारे में क्या कहते हैं। वे हमें बताते हैंः

फ्ऐसी कोई बात नहीं है जो हिंदुइज्म को एकरूप, और अपरिवर्तनीय बनाता है, चाहे यह विश्वास अथवा व्यवहार की ही बात क्यों न हो। हिंदूवाद एक आंदोलन है_ एक स्थिति नहीं है। यह एक प्रक्रिया है, परिणाम नहीं है। एक प्रगतिशील परम्परा है, वह स्थिर रहस्योदघाटन नहीं है। इसका अतीत का इतिहास हमें यह विश्वास करने के लिए प्रोत्साहित करता है कि यह किसी भी आपात स्थिति के समान रूप से उपयुक्त होगा। यदि भविष्य चाहे वह विचार के क्षेत्र में ही क्यों न हो या इतिहास सामने लाता है।य्

हमें इस बात से प्रसन्नता है कि यह भविष्यवाणी सत्य हो रही है। स्वामी विवेकानन्द ने पचास वर्ष पूर्व कहा था कि ‘वेदांत’ मानवता का धर्म होगा। वह वेदांत, जिसे हमारे मनीषियों, ऋषियों और मुनियों ने विश्व को दिया है। राधाकृष्णन् आगे लिखते हैंःµ

फ्हम नई दृष्टि से अपने प्राचीन धर्म पर विचार कर रहे हैं। हम यह महसूस करते हैं कि हमारा समाज अस्थायी संतुलन की दशा में है। ऐसी काफी चीजें हैं जो मृत और रोगग्रस्त हैं, जिसको स्वच्छ किया जाना है।य्

श्रीमान, मैं विश्वास करता हूँ कि हमारे अधिकांश मित्र अपने ही तरीके से हिंदू दर्शन और व्यवहार के भी नेता हैं। इसलिए मैं आश्वस्त हूँ किµ

फ्हिंदू दर्शन और व्यवहार के नेता इस बात से आश्वस्त हैं कि वे हिंदूवाद के आधारभूत सिद्धांतों से सहमत हैं, परन्तु अधिक जटिल और रोगग्रस्त सामाजिक व्यवस्था की आवश्यकताओं के विशेष संदर्भ में उनकी पुनर्व्याख्या जरूरी है।य्

उनका कहना हैµ

फ्यह प्रयास उस प्रक्रिया की केवल एक आवृत्ति होगी, जो हिंदूवाद के इतिहास में अनेक बार घटित हुई है। पुनर्समायोजन का कार्य प्रक्रियाबद्ध है। इसकी संवृद्धि मद्धिम है क्योंकि जड़ें गहरी हैं। परन्तु वे व्यक्ति जो अंधेरे में छोटी मोमबत्ती या छोटा दीप जलाते हैं, वे भी सम्पूर्ण आकाश को जगमग करने में सहायक होते हैं।य्

मैं हिंदू धर्म से संबंधित इस वक्तव्य को अपने उन मित्रों को बताना चाहूँगा, जो इस विधेयक का विरोध करते हैं। यहां तक कि धर्म के कारण विधेयक को विचारार्थ भी प्रस्तुत नहीं करना चाहते। क्या वे नहीं जानते और क्या वे याद नहीं करते कि ‘धर्म खतरे में है’ अथवा ‘समाज खतरे में है’ की आवाज़ तब भी उठाई गई थी जब अतीत में किसी सुधार के प्रयत्न किए गए थे। क्या यह तथ्य नहीं है कि पच्चीस वर्ष पूर्व जब अस्पृश्यता के विरुद्ध आंदोलन प्रारंभ किया गया था, हमारे कुछ लोग यहां तक उच्च दकियानूसी हिंदुओं